" श्रीरामचरितमानस की मूल प्रति "

" गोस्वामीतुलसीदास जी द्वारा लिखित रामचरितमानस की मूल पांडुलिपि के दर्शन कीजिए "

हिंदी साहित्य के महान कवि तुलसीदास द्वारा लिखी गई रामचरित मानस की हस्तलिखित पांडुलिपि 427 साल के बाद भी सुरक्षित रखी हुई है। इतने साल बाद भी इसके कागज न तो गले हैं और न ही खराब हुए हैं। 

पुजारियों ने बताया कि आख‍िर कैसे ये पांडुलिपि इतने सालों से सुरक्षित है।

जन्म के 2 दिन बाद ही हुई मां की मौत:

तुलसीदास का जन्म 1511 को चित्रकूट के राजापुर में हुआ था। कहा जाता है कि ये 12 महीने तक गर्भ में रहे थे। जन्म के दूसरे दिन ही इनकी मां हुलसी का निधन हो गया था।

पिता आत्माराम दुबे ने तुलसीदास को किसी विपत्ति से बचाने के लिए एक महिला को सौंप दिया था। लेकिन कुछ साल बाद उस महिला का भी निधन हो गया। इस तरह बचपन में ही तुलसीदास अनाथ हो गए थे।

इसके बाद बचपन में ही वो विद्वानों की शरण में आ गए, जहां इन्हें राम बोला नाम दिया गया। बाद में तुलसीदास कहा जाने लगा।

29 साल की उम्र में इनकी शादी रत्नावली से हुई थी। हालांकि, उनका गौना नहीं किया गया था। एक दिन उन्हें अचानक पत्नी की याद आई, तो रात में ही यमुना नदी तैरकर पार किया और पत्नी के पास पहुंच गए। उनकी इस हरकत पर पत्नी काफी नाराज हुईं थीं।

पत्नी की बात सुन तुलसीदास परेशान हुए और वापस लौट गए। इसके बाद वह जगह-जगह जाकर राम कथा सुनाते रहे। काफी समय काशी और अयोध्या में भी रहे।

इस बीच सपने में भगवान के आदेश के बाद उन्होंने 1587 में रामचरित मानस की रचना शुरू की। जिसे पूरा करने में 2 साल 7 महीने 26 दिन लगे। 150 पेज की हर पांडुलिपि पर 7 लाइन लिखी है। रामचरित मानस अवधि भाषा में है, जो हिंदी भाषा की एक बोली है।

जापानी टिशु पेपर और केमिकल से की गई है संरक्षित

खुद को मंदिर का उत्तराधिकारी बताने वाले रामाश्रय त्रिपाठी बताते हैं, "2004 में भारत सरकार के पुरातत्व विभाग, दिल्ली द्वारा पांडुलिपि सुरक्षित करने के लिए प्रयास किया गया। पुरातत्व विभाग ने जापान में बने पारदर्शी टिशु पेपर को इस पर लगाया है। साथ ही कागज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने वाले कैमिकल्स का भी इस्तेमाल किया है।" 

- ''सुरक्षा की दृष्टि से अधिकारियों को एक साथ पांडुलिपि देने से इनकार कर दिया गया था। 4-4 पेज दिल्ली भेजे जाने थे, जब ये संरक्षित होकर दिल्ली से आ जाते थे तो दूसरे पन्ने भेजते थे।''

विद्वानों ने इसके कागज को तुलसी कालीन माना है और लिपि को तुलसी हस्तलिपि माना है। तुलसीदास का प्रमाणिक हस्तलेख काशी नरेश के संग्रहालय में सुरक्षित है।

राजापुर में राम चरित मानस की अयोध्या काण्ड की पांडुलिपि सुरक्षित है। 11x5 के आकार के 170 पन्ने सुरक्षित हैं। 

अयोध्या काण्ड की इन पांडुलिपियों में हर हस्तलिखित प्रति में ‘श्री गणेशाय नमः और श्री जानकी वल्लभो विजयते’ लिखा हुआ है।

तुलसीदास के पहले शिष्य गणपतराम के वंशज आज भी इस तुलसी और मानस मंदिर में पुजारी बनते चले आ रहे हैं।

सुरक्षा में मौजूद रहती है पुलिस:
रात में यहां सुरक्षा के लिए पुलिस मौजूद रहती है। प्रशासन द्वारा पुलिस कर्मी यहां भेजे जाते हैं। उन्हें डर भी रहता है कि इसको कभी कोई चोर या अन्य नुकसान न पहुंचा दे।

सियावर रामचन्द्र की जय 🚩पवनसुत हनुमान की जय 🚩

Post a Comment

0 Comments