ॐ श्री गुरूवे नमः
शास्त्रों के अनुसार मानव जाति का प्रथम गुरु माता होती है द्वितीय गुरु पिता होता है। इसके बाद अध्यात्मिक गुरु सद्गुरु इत्यादि आते हैं।
स्त्रियों के लिए शास्त्र कहते है कि जब उनका विवाह हो जाता है तो पति ही उनका विशेष गुरु होता है ऐसा शास्त्रों में लिखा है ।
स्त्रियों को हर एक धार्मिक कार्य और सामाजिक कार्य किसी भी प्रकार का कार्य करने से पहले पति की राय लेनी आवश्यक है।
पति से वमर्श वार्तालाप नारियों को कर लेनी चाहिए पति की आज्ञा लेनी चाहिए ऐसा शास्त्र कहते हैं।
परंतु कलयुग में सब उल्टा पुल्टा हो गया है कोई धर्म परायण बचा ही नहीं है।
ना तो पति अपने धर्म का पालन करता है ना तो पत्नियां अपने धर्म का निर्वहन करती हैं।
ऐसे में धर्म क्या है धर्म क्या है अपने अपने मंतव्य हर कोई प्रस्तुत करता है। लेकिन विचार मंथन कर अगर देखा जाए कि जिस पद प्रतिष्ठा के लिए धर्म निर्धारित किया जाता है वह निश्चित ही लाभकारी होता है।
भौतिकता के भाग दौड़ में धार्मिकता को सभी लोग भूल गए हैं तो कलयुग में क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता।
"विदितु मामाप्येतद्याथा नार्याः पतिर्गुरूः"
"वालमिकि रामायण" मे ४/८/१७ में कहा कि पति ही स्त्री का विवाहोपरान्त प्रथम् गुरू है एेसा कहा गया है।
पतिहिं देवता नार्याः पतिर्वन्धुर्पतिर्गुरूः।
प्राणौरपि प्रियं तस्माभ्दर्तु कर्यविशेशषतः
नारी के लिये पति ही भर्ता है अर्थात भरण पोषण करने वाला है। पति ही देवता है अर्थात वही उसको सब कुछ प्रदान करने वाला है।नारी का पति ही प्राणप्रिय होता है इसके अलावा विशेष रूप से पति ही नारी का गुरू होता है ।
ऐसा शास्त्र कहते है।
"मनुमहाराज"
यद्वौकिञ्चमनुरवदत्त भ्दर्तुः पतिसेवा गुरौवासु।
मनुमहराज करते है कि पति की सेवा करनी चाहिये पति के सेवा मे गुरू का वास होता है।
भर्ता देवो गुरूर्भर्ता धर्म तिर्थ ब्रतानि च।
तस्मात्सर्व परित्यज्य पतिरेंकं समर्ययेत।।
पति ही देवता है पति ही गुरू है पति ही धर्म तिर्थ और नाना प्रकार का ब्रत भी है।शास्त्र कहते है कि सब कुछ छोड कर पति को गुरू मान कर समर्पित हो जाना चाहिये।
"पतिरेको गुरूःस्त्रीणाम्"
स्त्रियों का केवल एक गुरू होता है वह है पति ।ऐसा शास्त्र कहते है ।
जय वैदिक सनातन धर्मस्य 🔱 🏹 🪈 🚩
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