काकोरी काण्ड में ब्रिटिश सरकार के वकील जगत नारायण मुल्ला

काकोरी काण्ड में मुकदमा और जगत नारायण 'मुल्ला'

काकोरी काण्ड का मुकदमा लखनऊ में चल रहा था। 

पण्डित जगतनारायण मुल्ला सरकारी वकील के साथ उर्दू के शायर भी थे। उन्होंने अभियुक्तों के लिये "मुल्जिमान" की जगह "मुलाजिम" शब्द बोल दिया। 

फिर क्या था, पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने तपाक से उन पर ये चुटीली फब्ती कसी: 

"मुलाजिम हमको मत कहिये, बड़ा अफ़सोस होता है; 

अदालत के अदब से हम यहाँ तशरीफ लाये हैं। 

पलट देते हैं हम मौजे-हवादिस अपनी जुर्रत से,

कि हमने आँधियों में भी चिराग अक्सर जलाये हैं।" 

उनके कहने का मतलब था कि मुलाजिम वे (बिस्मिल) नहीं, बल्कि मुल्ला जी हैं जो सरकार से तनख्वाह पाते हैं। वे (बिस्मिल आदि) तो राजनीतिक बन्दी हैं अत: उनके साथ तमीज से पेश आयें। 

इसके साथ ही यह चेतावनी भी दे डाली कि वे समुद्र की लहरों तक को अपने दुस्साहस से पलटने का दम रखते हैं; मुकदमे की बाजी पलटना कौन सी बड़ी बात है? 

भला इतना बोलने के बाद किसकी हिम्मत थी जो बिस्मिल के आगे ठहरता। मुल्ला जी को पसीने छूट गये और उन्होंने कन्नी काटने में ही भलाई समझी। वे चुपचाप पिछले दरवाजे से खिसक लिये। फिर उस दिन उन्होंने कोई जिरह नहीं की।

नीचे दिया गया छायाचित्र जगत नारायण 'मुल्ला'

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