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सेशनकोर्ट में स्पेशल जज श्री हेमिल्टन साहब की इजलास में मामला शुरु हुआ ।
उस दिन 21 मई थी । लगातार 1 वर्ष तक मुकद्दमा चलता रहा।अभियुक्त बेचारों के लिए 1 साल तो टलुहापन्थी में ही जेल होगई।
सरकार की ओर से अभियुक्तों के लिए पं0 हरकरणनाथ मिश्र वकील नियुक्त हुए और सरकार के पक्ष में पं0 जगतनारायण मुल्ला तैनात किये गये ।
उन्होंने बाक़ायदा 1 साल तक 500 रू0 रोजाना गवर्नमेण्ट की जेब से निकाले ।
पं0 जगतनारायण मुल्ला के प्रतिरोध में अकेले मिश्र जी को अभियुक्तों की ओर से नियुक्त करना किस श्रेणी का न्याय है ।
कुछ भी हो, पं0 जगतनारायण मुल्ला ने तो सरकार बहादुर से एक लाख से अधिक पुजवाया ।
खैर, भाई गरीब के भी राम हैं !
यहां पं0 हरकरननाथ मिश्र के अतिरिक्त अभियुक्तों की ओर से कलकत्ते के मि0 चौधरी, लखनउ के श्री मोहनलाल सक्सेना, श्री चन्द्रभाल गुप्त, श्री कृपाशंकर हलेजा आदि वकील थे ।
इन्होंने बड़ी उदारता, लगन, त्याग और तत्परता के साथ वकालत की । सेशन-कोर्ट में अभियुक्त अपनी सफाई में बहुत से गवाह पेश करना चाहते थे । किन्तु बाद में यह तय हुआ कि बहुत से गवाह पेश करने से कोई लाभ नहीं होगा ।
इसलिये थोडे़ ही गवाह पेश किये गये । अभियुक्तों ने अनेक मिन्नतें और प्रार्थनायें की कि, उनका मुकद्दमा हेमिल्टन साहब की अदालत से मुन्तकिल किया जाये, किन्तु कौन सुनता है ?
इस तरह की निरंकुशता देख अभियुक्तों को और निराशा हुई ।
श्री रामप्रसाद बिसमिल ने 26 जून 1926 को एक दरख्वास्त इसी आशय की दी, जो गुप्त रखी गई । मालूम नहीं उसका क्या हुआ । बाकायदा नकल मांगने पर उसकी नकल देने से भी साफ इन्कार कर दिया गया । मामला इन्हीं हुजूर की अदालत में चलता रहा।
मामला चल रहा था। बड़ी निरंकुशता जारी थी । किन्तु देशभक्ति और मर मिटने की तमन्ना ने अभियुक्तों का जेल-जीवन भी आमोदमय बना रखा था ।
अभियुक्तों का कचेहरी आने-जाने का दृश्य दर्शनीय होता था । वह बीर-बांकुरे, राजहंस जैसे राजकुमार और तपस्वी जिस समय मोटर से उतरते थे, मालूम होता था मूर्तिमान सुरेश देवताओं सहित इहलोक लीला देखने के हेतु आये हैं ।
पं0 रामप्रसाद बिसमिल के पीछे जब सब आत्मायें वन्देमातरम् गाती हुई चलती थीं– उस दृश्य में एक अलौकिक छटा थी । जिस के वर्णन करने के लिए तुलसी दासजी के शब्दों में यही कहना पड़ता है कि गिरा अनयन नयन बिनु बानी ।
धन्य है वे आंखें जिन्होंने जी भर के उन की मस्तानी अदा को निरखा । उन के मोटर से उतरते ही वन्देमातरम्, भारत माता की जय, भारत प्रजातन्त्र की जय आदि के घोष से कचहरी का वायुमण्डल पवित्र हो जाता थां ।
उनको देखने के लिए और मधुर गीत सुनने के लिए हजारों की भीड़ इकट्ठी होती थी ।
अधिकारियों के हृदय इस नाद को सुन कर दहल उठते थे । बेचारे क्या करते !
एक दिन कहीं ताव में आकर एक कान्स्टेबल महाराज ने एक अभियुक्त के हाथ लगाया ही था कि स्वाभिमानी मस्ताना की आंखों में खून उतर आया उन से न रहा गया और एक ने कान्स्टेबल के थप्पड़ मारा, फिर क्या था, दूसरी आफ़त खड़ी हुई ।
एक नया मुकदमा पुलिस ने ज़िलाधीश के यहां दायर कर दिया । किन्तु फिर आपस में समझौता हो गया ।
अदालत का दृश्य तो एक खास खूबसूरती रखता था । एक ओर पंडित राम प्रसाद, श्री योगेश बाबू, श्री विष्णुशरण दुबलिस, श्री सचीन और श्री सुरेश बाबू अपनी स्वाभाविक स्वाभिमानता मिश्रित गम्भीरतासे मुकद्दमों को सुनते थे, तो बगल में ही मन्मथ, राजकुमार, रामदुलारे, रामकिशन, प्रेमकिशन इत्यादि की चुहलबाजियों के मारे कोर्ट की नाक में दम था । उनके इस दृश्य को देखने के लिए अदालत के आस-पास खुफिया पुलिस के दूतों की भरमार होते हुए भी बहुत से लोग इक्कट्ठे रहते थे । कचहरी में कोई प्रेस रिपोर्टर आ भी गया, तो पुलिस महारानी के मारे बिचारे के आफत थी ।
काकोरी-काण्ड के क्रान्तिकारी
सबसे ऊपर राम प्रसाद 'बिस्मिल' एवं अशफाक उल्ला खाँ नीचे ग्रुप फोटो में क्रमश: (from left to right)1.योगेशचन्द्र चटर्जी, 2.प्रेमकृष्ण खन्ना, 3.मुकुन्दी लाल, 4.विष्णुशरण दुब्लिश, 5.सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य, 6.रामकृष्ण खत्री, 7.मन्मथनाथ गुप्त, 8.राजकुमार सिन्हा, 9.ठाकुर रोशनसिंह, 10.पं॰ रामप्रसाद 'बिस्मिल', 11.राजेन्द्रनाथ लाहिडी, 12.गोविन्दचरण कार, 13.रामदुलारे त्रिवेदी, 14.रामनाथ पाण्डेय, 15.शचीन्द्रनाथ सान्याल, 16.भूपेन्द्रनाथ सान्याल, 17.प्रणवेशकुमार चटर्जी
वंदेमातरम् 🚩
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