यह है चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य परमार का विशाल साम्राज्य जो एशिया में फैला हुआ था और विक्रम संवत 1 ही इसा पूर्व 56 हैं। अर्थात इसी वर्ष शकों को खदेड़ कर विक्रम संवत चलाया गया था।
ईसा के जन्म के 56 वर्ष पूर्व चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य परमार ने विक्रम संवत चलाया था।
अतः हमे चाहिए कि हम अपने हिंदू सम्राट द्वारा चलाए गए विक्रम संवत के अनुसार ही नववर्ष चैत्र के प्रथम दिन मनाएं। और इस जानकारी का और सभी हिंदू भाई और सभी भारतीय प्रसार करें और सभी को विक्रम संवत के प्रति जागरूक करें।
महान हिंदू सम्राट विक्रमादित्य के बारे में लगभग आज सब भूल गये हैं, अतः सबको विक्रमादित्य परमार के इतिहास से परिचित कराए। यह भारत की आन बान और शान का प्रतीक महान और विशाल साम्राज्य देखकर अंग्रेजो के पिछवाड़े में आज भी जलन होती है,
मुल्लो के इस्लाम के उदय से कई वर्षों पूर्व अरब में चक्रवर्ती विक्रम सेन का राज था और सनातन धर्म का पालन किया जाता था, और तो और विक्रमादित्य के अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम कितनोई ने अपनी पुस्तक सायर-उल- ओकुल" में किया हैं तथा अरब में पत्थर पर विक्रमादित्य के समय का आज्ञापत्र भी लिखा है।
ईरान का राजा मित्रडोट्स प्रजा पर अत्याचार करने वाला शासक था, उसका वध चक्रवर्ती विक्रमादित्य ने किया इस बात का जिक्र स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने भी अपने लेख में लिखा है।
विक्रमादित्य का साम्राज्य पूर्व में चीन के साथ अरब ईराक और टर्की तक फैला हुआ था।
महाकवि कालिदास भी उनके दरबार में एक नवरत्नों में शामिल विद्वान थे। कई हजार विद्वान भारत से विक्रमादित्य ने अरब यमन और अनेक विदेशी स्थानों में भारतीय विद्या और शिक्षा के प्रसार के लिए भेंजे थे।
सायर-उल-ओकुल में भी जरहाम कितनोई ने लिखा है। इसी कारण भारतीय विधाएं जैसे इंद्रजाल, समुद्र शास्त्र, मार्शल आर्ट (आयुर्वेद की मर्दन चिकित्सा ) आदि तथा एक्युप्रेशर जैसी चिकित्सा विदेशों में फैली।
विक्रमादित्य एक नाम ही नहीं उपाधि भी है जो विक्रम सेन परमार के नाम से दी जाने लगी। विक्रमादित्य की उपाधि पराक्रमीयों को ही मिलती थी। कई सम्राटों ने इसे प्राप्त भी किया और अपने नाम के आगे विक्रमादित्य लगाया।
आर्यावर्त का अघोर अतीत 🚩
जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩
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