" महाद जी सिंधिया "

बात सन् 1761 की है .. 

पानीपत का युद्ध समाप्त हो चुका था और एक लाख मराठे मारे गए थे .. 

इस युद्ध मे सबसे ज्यादा नुकसान पेशवा वंश का हुआ था क्योंकि उसके उत्तराधिकारी विश्वास राव भी वीरगति को प्राप्त हो  गये  थे ..

मगर एक वंश और भी था जिसने अपने 4 हीरे और 11 मोती खो दिए थे .. ये थे सिंधिया .. 

पानीपत के युद्ध में सिंधिया परिवार 16 लोग शहीद हुए थे जिसमे से 4 पुत्र राणों जी सिंधिया के शहीद हुए। 

बस एक बच गए महादजी सिंधिया ..

युद्ध में महादजी सिंधिया का पैर घायल हो गया था और वे 2 साल तक चल - फिर नहीं पाए ..

महादजी के भाइयों को बेरहमी से मारा गया था ..

उत्तर भारत में अफगानी पठानों का भारी प्रभाव था..  इनके सरदार नजीब खान ने ही अब्दाली को बुलवाया था और इन सभी पठानों ने इस्लाम के नाम पर अब्दाली को समर्थन दिया था और भारत से गद्दारी की थी ..

इसलिए महादजी ने प्रण लिया कि भारतभूमि पर अब कोई अफगान जिंदा नही बचेगा ..

अफगानों ने प्रण के बारे में सुना और मजाक समझ कर भूल गए .....

1766 में महादजी सिंधिया स्वस्थ होकर पुणे आये .. सिंहासन पर बैठे पेशवा माधवराव के सामने अपनी तलवार निकाल कर रख दी और कहा आप बस इसे चलाने का आदेश दें मैं सारे अफगानों के सिर आपके कदमो में रख दूंगा .. 

पेशवा दंग रह गए किन्तु पेशवा ने उनकी छिपी प्रतिभा को पहचान  लिया ..... उन्हें अपना सेनापति और आगरा व अजमेर का सूबेदार बनाया ..

फिर शुरू हुआ भयंकर नरसंहार ..... 1767 में महादजी सिंधिया ने यमुना पार किया और मराठा साम्राज्य का विस्तार शुरू किया ..

1771 में उन्होंने फिर से दिल्ली के लाल किले पर भगवा फहरा दिया .. 

दिल्ली में महादजी ने अपनी तलवार हवा में लहरा दी और अफ़गानों की हत्या का एलान कर दिया ..... 
जिसका सीधा अर्थ था जहाँ भी कोई अफगान दिखे उसे मार डालो .....

1766 से पठानों के मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ वो 1773 तक जारी रहा .....

मराठों ने चुन चुन कर पानीपत का बदला लिया और 5 लाख पठानों का कत्लेआम कर दिया .....

नजीब खां की किस्मत अच्छी थी कि वो पहले ही मर गया मगर उसका बेटा दर बदर ठोकर खाता रहा .....

उस समय मराठों का खौफ इतना अधिक था कि पठानों को कहीं शरण भी नहीं मिली  .....

इसके बाद मराठों ने रुहेलखंड पर हमला किया .. हरिद्वार में पठानों ने मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बना दी थीं .. मस्जिदों में घुसकर भयंकर कत्लेआम हुआ ..... 

कोई धार्मिक सदभावना नहीं दिखाई गई ..  एक लाख से ज्यादा अफगानों को मौत के घाट उतार दिया गया .....  

टूटे हुए मंदिरों को फिर से खड़ा किया गया  .....

पठानों की मौत का समाचार अब्दाली को मिल गया था मगर डर कर इस बार वो कुत्ता भी इन्हें बचाने नही आया .....

पठानों में भागदौड़ मच रही थी ..  कुछ नेपाल भाग गए तो कुछ सिखों के क्षेत्र में .....

महादजी ने सिखों को भी पत्र लिखा और पठानों को मराठों के हवाले करने को कहा और समझाया कि एक हिन्दू दूसरे हिन्दू से ना लड़े .. इसलिए सिखों ने नवरात्रि के समय सभी पठानों को पकड़ कर मराठों को सौंप दिया  ..

मराठों ने इन सबके सिर काटकर तुलजा भवानी को बलि चढ़ाई .....

अंततः एक समय ऐसा आया कि अफगान भारत मे बचे ही नहीं  ..

हिन्दुओं के भीषण क्रोध के परिणाम स्वरूप भारत से अफगानों का अस्तित्व ही लगभग समाप्त हो गया  .....
 
आज भी अगर आप उत्तर भारत मे जाएंगे तो आपको अफरीदी और अफगानी पठान मुट्ठी भर ही मिलेंगे .. जबकि पहले भारत में उनकी बड़ी बड़ी बस्तियां हुआ करती थीं .....

ये होता है सनातनी हिन्दुओं का क्रोध  .....

हिन्दू बहुत सहिष्णु समाज है .. उसे सहिष्णु बनाये रखें वरना जिस दिन इनका क्रोध भड़का उस दिन दुनिया  की कोई ताकत इनका मुकाबला नहीं  कर पायेगी .....

जय हिंदुत्व 🚩
जय भवानी 🚩
जय शिवाजी 🚩

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