सबसे मुश्किल काम है चुप रहना और आलोचना सुनना।
यह आवश्यक नहीं कि हर लड़ाई जीती ही जाए, आवश्यक तो यह है कि हर हार से कुछ सीखा जाए।
कड़वाहट इतनी बढ़ती जा रही है कि हम सोशल मीडिया पर कही-लिखी अपनी बात को लेकर भी इतने ज़िद्दी हो जा रहे हैं कि या तो उसे कुतर्कों से सिद्ध करना चाहते हैं या फिर अपने सम्बन्ध ख़राब कर रहे हैं।
नकारात्मकता की यह पराकाष्ठा कहां पर लेकर जाएगी।
दूसरों को अपना मूड तय न करने दें।
हर सुबह तय करें हम स्वस्थ शांतिपूर्ण दयालु और प्यार से खुश हैं।
जितना पॉजिटिव रहोगे उतनी सकारात्मक ऊर्जा मिलती रहेगी।
सम्बन्ध वर्षा जैसा नही होना चाहिए, जो बरस कर खत्म हो जाए बल्कि सम्बन्ध हवा की तरह होना चाहिए जो खामोश हो मगर सदैव आसपास हो।
सम्बन्धों की पूंजी सहेजिये श्रीकृष्ण की तरह,
जो उन्होंने सुदामा के साथ निभाया,
जो उन्होंने अर्जुन के साथ निभाया,
जो उन्होंने उद्धव के साथ निभाया,
जो उन्होंने अपनी भक्त गोपियों के साथ निभाया।
उन्होंने इसे भूलोक पर अपने अवतरण की सबसे बड़ी प्राप्तियों में समझा।
ईश्वर की कथाएँ सिर्फ़ सुनने सुनाने की नहीं होतीं, गुनने की होती हैं, उन्हें आत्मसात करना होता है।
आनंदित रहें क्योंकि इससे बड़ा सुख कोई नहीं।
ईश्वर आपकी हर मुस्कान में दूसरों को नज़र आएंगे।
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