सन् 1962 में जब गद्दार देश चीन ने भारत से दोस्ती के नाम पर भारत की पीठ में छुरा खोंपकर अपनी सेनाओं के साथ भारत के ऊपर आक्रमण कर दिया था।
चीन की सेनाओं से भारतीय सेना हर मोर्चे पर मुकाबला कर रही थी, फिर भी चीन ने भारत की जमीन पर कई जगह अवैध कब्जा कर लिया था।
उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। चीन के इस धोखे से स्वामी जी भी स्तब्ध रह गये। इस अचानक हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। नेहरू जी के मित्र रूस तथा मिश्र देश के राष्ट्रपतियों ने इस हमले में हस्तक्षेप करने से नेहरू जी को मना कर दिया था।
तभी एक योगी ने पंडित ज्वाहरलाल नेहरू को मां पीताम्बरा पीठ, दतिया के संस्थापक श्री श्री 1008 स्वामी जी से मिलने के लिए कहा।
जवाहरलाल नेहरू के पर्सनल सेकेट्री ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को एक मैसेज भेजा कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू दतिया में मां पीताम्बरा पीठ आना चाहते हैं।
जवाहरलाल नेहरू शासकीय विमान से झांसी आए, उसके बाद कार से दतिया पीताम्बरा पीठ पधारे तथा स्वामी जी से मिले।
नेहरू जी ने व्यक्तिगत मुलाकात कर अपनी समस्या बतायी।
श्री स्वामी जी ने माँ पीताम्बरा की अनुमति लेकर राष्ट्रहित में एक यज्ञ करने की योजना बनायी।
यज्ञ में सिद्ध पंडितों, तांत्रिकों व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यज्ञ का यजमान बनाकर यज्ञ प्रारंभ किया।
कहते हैं यज्ञ के नौंवे दिन जब यज्ञ का समापन होने वाला था तथा पूर्णाहुति डाली जा रही थी उसी समय संयुक्त राष्ट्रसंघ का पंडित जवाहरलाल नेहरू को संदेश मिला कि चीन ने आक्रमण रोक दिया है और अपनी फौजों को पीछे हटने को कहा है।
आज भी यह यज्ञशाला जिसमें राष्ट्रहित के लिए यज्ञ हुआ था बनी हुई है।
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