" गुरु अर्जुन देव जी "

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गुरु गद्दी संभालने के बाद गुरु अर्जुन देव जी ने लोक भलाई तथा धर्म प्रचार के कामों में तेजी ला दी। आपने गुरु रामदास जी द्वारा शुरू किए गए सांझे निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी। 

नगर अमृतसर में आपने संतोखसर तथा अमृत सरोवरों का काम मुकम्मल करवा कर अमृत सरोवर के बीच हरिमंदिर साहिब जी का निर्माण कराया, जिसका शिलान्यास मुसलमान फकीर साईं मियां मीर जी से करवा कर धर्मनिरपेक्षता का सबूत दिया और अमृतसर शहर आस्था का केन्द्र बन गया। 

आप जी ने नए नगर तरनतारन साहिब, करतारपुर साहिब, छेहर्टा साहिब, श्री हरगोबिंदपुरा आदि बसाए। तरनतारन साहिब में एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया जिसके एक तरफ तो गुरुद्वारा साहिब और दूसरी तरफ कुष्ठ रोगियों के लिए एक दवाखाना बनवाया। यह दवाखाना आज तक सुचारू रूप से चल रहा है। 

सामाजिक कार्य के रूप में गांव-गांव में कुंओं का निर्माण कराया। सुखमणि साहिब की भी रचना की जिसका हर गुरसिख प्रतिदिन पाठ करता है।

गुरु अर्जुन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन भाई गुरदास की सहायता से किया और रागों के आधार पर ग्रंथ साहिब में संकलित बाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। 

गुरु जी ने सदैव ही अपने सिखों को परमात्मा पर हर समय भरोसा रखने तथा सर्व सांझीवालता का संदेश दिया। 

एक बार सुलही खान, जो मुगल राजा था, गुरु जी पर चढ़ाई करने आ गया। जब संगत को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने गुरु जी को कहा कि कोई पत्र लिखकर सुलही खान को भेजा जाए, जिसमें उसे हमला न करने की सलाह दी गई हो। 

कुछ लोगों का कहना था कि एक प्रतिनिधिमंडल भेजा जाए, जो उसे सिख धर्म के बारे में बता सके तथा हमला न करने संबंधी राजी कर सके जबकि कुछ अन्य लोगों का कहना था कि सुलही खान का मुकाबला करने के लिए हमें कोई न कोई उपाय करना चाहिए। 

गुरु अर्जुन देव जी ने उन्हें समझाते हुए कहा कि उन्हें परमेश्वर पर पूर्ण विश्वास है। इस संबंध में आप जी का उच्चारण किया हुआ एक शब्द भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है।

अकबर की सम्वत 1662 में हुई मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर बादशाह बना तो गुरु जी के भाई पृथ्वी चंद ने उससे नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दीं। 

जहांगीर गुरु जी की बढ़ती लोकप्रियता को पसंद नहीं करता था। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई कि गुरु अर्जुन देव जी ने उसके भाई खुसरो की मदद क्यों की। 

जहांगीर ने अपनी जीवनी ‘तुज़के जहांगीरी’ में स्वयं भी लिखा है कि वह गुरु अर्जुन देव जी की बढ़ रही लोकप्रियता से आहत था, इसलिए उसने गुरु जी को शहीद करने का फैसला कर लिया। 

गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा व सियास्त’ कानून के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। 

‘यासा व सियास्त’ के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। 

गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया, जहां गुरु जी का पावन शरीर आलोप हो गया। 

जहां आप ज्योति ज्योत समाए उसी स्थान पर लाहौर में रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब (जो अब पाकिस्तान में है) का निर्माण किया गया है। 

गुरु अर्जुन देव जी ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया। आप विनम्रता के पुंज थे। कभी भी आपने किसी को भी दुर्वचन नहीं बोले। 

गुरु अर्जुन देव जी का संगत को एक और बड़ा संदेश था कि परमेश्वर की रजा में राजी रहना। जब आपको जहांगीर के आदेश पर आग के समान तप रही तवी पर बिठा दिया, उस समय भी आप परमेश्वर का शुक्राना कर रहे थे:

‘तेरा कीया मीठा लागै॥ 
हरि नामु पदार्थ नानक मांगै॥’

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