" हम कौन हैं "



हम सब आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर की सन्तान हैं, कुल वंश, परम्परा से हम ऋषि पुत्र हैं तथा भौतिक रूप से मूल में भारत माता की सन्तान हैं। क्योंकि प्रथम पिता यह राष्ट्ररूपी पिता है तथा प्रथम माता यह धरती-माता या मातृभूमि है -माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: (अथर्ववेद 12.1.12)। 

अत: हमारा कर्त्तव्य है हम सब मिलकर भगवान~ का साम्राज्य अर्थात स्वर्ग धरती पर लाएं। हम ऋषियों के वंशज हैं, अत: भारत को ऋषि भूमि बनाएं तथा भारत माता की सन्तान होने का धर्म निभाते हुए भारत को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाएं।

आत्म-स्वरूप या स्वभाव :-

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सदाचार, प्रेम, करूणा, सेवा, सद~भावना, आनन्द, शान्ति, ज्ञान, शौर्य, साहस, धैर्य, सहजता, कर्मशीलता ये हमारे स्वभाव, धर्म या स्वरूप हैं। 

स्वभाव उसको कहते हैं जिसमें हम 24 घण्टे जीतें हैं। सहज प्रेम व सत्य आदि में हम 24 घण्टे जीते हैं अथवा जीना चाहते हैं अत: ये हमारे स्वभाव हैं। 

लेकिन काम, क्रोध व अहंकार आदि, यदि एक क्षण के लिए भी हमारे मन में उठते हैं तो हमें कष्ट देते हैं। 

अत: अविद्या आदि पाँच क्लेश व अज्ञान-मूलक काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकारादि पाँच विकार इन्द्रियों का व मन का मिथ्यारूप बोध ये हमारे स्वभाव, स्वधर्म व स्वरूप नहीं हैं।

व्यक्ति की शक्ति :- 

भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रथम होने की शक्ति, सामथ्र्य व ज्ञान दिया है। जो क्षमता सृष्टि के आदिकाल से अब तक विश्व के महान~ आदर्श महापुरूषों में थी वही सम्पूर्ण क्षमता हम सब में है। 

अत: हमें जीवन के हर श्रेष्ठ क्षेत्र में प्रथम बनना है तथा अपने देश को भी प्रथम बनाना है। हमारे राष्ट्र में भी विश्व के प्रथम राष्ट्र होने की सम्पूर्ण क्षमता है।

विचार की शक्ति :- 

जीवनव मन एक खेत की तरह है तथा विचार बीज की तरह। जीवन व चित्त-रूपी भूमि में जैसे विचारों के बीज डालेंगे वैसा ही हमारा जीवन, आचरण व चरित्र हो जायेगा। 

हम जो कुछ भी हैं सदाचारी-दुराचारी, हिंसक-अहिंसक, शाकाहारी-मांसाहारी, सुखी-दु:खी, सफल-असफल, शांत-अशांत, आस्तिक-नास्तिक, ईमानदार-बेईमान, अच्छे या बुरे आदि सब कुछ हमारे विचारों के कारण से हैं। अत: ऊँचे व श्रेष्ठ विचार ही महान् जीवन के आधर होते हैं।

कर्म :- 

जो हम करते हैं वही हमको मिलता है तथा वह कई गुणा होकर मिलता है जैसे सरसों, तिल, बाजरा आदि जो कुछ भी हम जमीन में डालते हैं वह हमें फसल के रूप में कई गुणा होकर मिलता है। दान व सेवा में भी यही सिद्धांत लागू होता है।

पाप-पुण्य :-

जिस काम को करने में आत्मा हमको रोके वह काम पाप है जैसे- हिंसा, झूठ, दुराचार, व्यभिचार इत्यादि। जिस काम को करने में आत्मा को सुख, शान्ति व तृप्ति मिले वह पुण्य है जैसे- योग, ध्यान, सेवा, दान इत्यादि।

तप से ऐश्वर्य :- 

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तप व त्याग से ही संचालित हो रहा है, जिनको कुछ चाहिए वो कुछ तो कर सकते हैं परन्तु सबकुछ नहीं कर सकते हैं। जिनको कुछ नहीं चाहिए, वो सबकुछ कर सकतें हैं।

जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् 🚩

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