श्रीरामचरितमानस आधारित दिब्य - विश्लेषण अनिवर्चनीय !!
करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। देइ ईस फल हृदय बिचारी।।
पुरुषार्थं फलति सर्वदा।।
होइहैं सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढ़ावहिं साखा।।
अति विचित्र भगवंत गति, को जग जानन जोग।।
भाग्यं फलति सर्वदा " प्रारब्ध "
दंडकारण्य में राम को विलाप करते देखकर सती संशयग्रस्त हो गयीं। भगवान शिव के समझाने पर भी उनका संशय दूर नहीं हुआ।अंत में शिव ने उनकी भ्रान्ति की गहराई को समझने के लिए,उनसे श्रीराम की परीक्षा लेने का प्रस्ताव रखा।सती परीक्षा लेने के लिए चल पड़ीं। सती के जाते ही शिव के मन में यह प्रश्न उठता है कि, यह क्या होने जा रहा है?
उन्होंने जान लिया कि सती का महान् अकल्याण होने जा रहा है।किन्तु अगले ही क्षण वे यह सोचकर शान्त हो जाते हैं कि,जो प्रभु की इच्छा होगी,वही होगा।यही उनका अंतिम निष्कर्ष होता है।
सारे संदर्भ से अलग करके इस तथ्य को देखने पर ऐसा जान पड़ता है कि उपर्युक्त पंक्ति ब्यक्ति को अकर्मण्यता और निष्क्रियता की दिशा में ले जाती है। पुरुषार्थवादियों को ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी पंक्तियाँ समाज को पतन के गर्त में ले जाती हैं।
भाग्यवादियों की यह धारणा है कि ब्यक्ति का जीवन सर्वथा परतंत्र है। जन्म के साथ ही ब्रह्मा ब्यक्ति के मस्तक में उसका भाग्य अंकित कर देते हैं, और व्यक्ति का जीवन, उन्हीं भाग्य रेखाओं के द्वारा संचालित होता है। देवता और मुनि भी उसमें परिवर्तन नहीं कर सकते-
कह मुनीस हिमवंत सुनु, जो बिधि लिखा लिलार।
देव, दनुज, नर, नाग, मुनि, कोऊ न मेटनिहार।।
पुरुषार्थवादी कहता है कि पुरुषार्थ ही सब कुछ है। देव और भाग्य का नाम तो केवल आलसी व्यक्ति ही लिया करते हैं।जैसा लक्ष्मणजी कहते हैं--
कादर मन कहँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
कई बार कर्म सिद्धान्त के इन दो विरोधी धारणाओं के मध्य ब्यक्ति भ्रमित हो जाता है कि, इन दोनों में यथार्थ सत्य क्या है?क्या मनुष्य नियति का खिलौना मात्र है, अथवा पुरुषार्थ ही सब कुछ कर सकता है?
यदि जीवन में दोनों का स्थान है, तो दोनों के बीच में बिभाजन की कौन सी रेखा विद्यमान है, जिसके द्वारा ब्यक्ति यह निर्णय कर सके कि पुरुषार्थ की रेखायें कहाँ समाप्त होती हैं और नियति का राज्य कहाँ से शुरू होता है। रामचरित मानस का इस विषय पर दृष्टिकोण एकांगी न होकर सर्वथा संतुलित है।वह दोनों की सत्ता को स्वीकार करता है।
राजनीति की भाषा में लगता है कि प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो पड़ोसी राष्ट्रों की तरह रहते हैं। राजनैतिक मान्यता यह है कि पड़ोसी राष्ट्रों में मित्रता की संभावनायें कम होती हैं। अधिकांश व्यक्तियों के जीवन में नियति व पुरुषार्थ का संघर्ष चलता रहता है, इसलिए दोनों की सीमा रेखायें भी परिवर्तित होती रहती हैं।
कभी भाग्य के सैनिक पुरुषार्थ की सीमा रेखा में घुस कर उसे विनष्ट करने पर तुल जाते हैं, तो कभी पुरुषार्थ के सैनिक भाग्य की सीमारेखा को छिन्न भिन्न कर देते हैं। यह अंतहीन संघर्ष है।विजय के परिवर्तन के साथ विजय गीत भी बदलता है।
प्रयास सफल होने पर पुरुषार्थ की जय ध्वनि होती है,किन्तु शत् शत् प्रयासों के बाद विफल होने वाला ब्यक्ति भाग्य देवता के सामने नतमस्तक हो जाता है, उसकी सामर्थ्य के गीत गाने लगता है। कई व्यक्ति इन विरोधाभाषी पंक्तियों के आधार पर ही पतन और उत्थान की प्रेरणा के सूत्र खोज निकालते हैं।
भारत विश्व का सबसे पुरातन राष्ट्र है। उत्थान और पतन के अनगिनत चक्रों को को उसने स्वयं देखा है। उसकी अनुभूतियों ने उसे सहिष्णुता की शक्ति प्रदान की है। जो नहीं मानते हैं, देर सबेर काल उनकी धारणाओं में भी परिवर्तन कर ही देगा।
काल की कल्पना दो रूपों में की जा सकती है। काल विष्णु का चक्र है, जो चक्राकार होने के कारण लौटकर आता रहता है। भगवान राम के धनुष, बांण को काल का प्रतीक मानते हुए कहा गया है-
लव निमेष परमान जुग वरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को काल जासु कर दंड।।
काल अपेक्षाकृत सीधे चलता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वह भी लौटकर पुनः श्रीराम के निषंग में ही आ जाता है। दिन, रात्रि, मास और वर्ष का परिवर्तन चक्र सर्वव्यापी है।
जो लोग काल और इतिहास को सीधी रेखा की भाँति प्रस्तुत करते हैं, उनकी दृष्टि संकुचित और ससीम है। समतल धरती की कुछ दूरी में रेखा खींचने पर वह सीधे आगे बढ़ती हुई प्रतीत होती है, किन्तु यदि रेखा का विस्तार करते हुए, उसे सीधे ले जाने की चेष्टा की जाए, तो अन्त में वह चक्राकार ही हो जाएगी, क्योंकि पृथ्वी स्वयं भी तो गोल है।
काल की चक्राकार गति में ही नियति का रहस्य छिपा हुआ है।किन्तु इससे पुरुषार्थ की महिमा समाप्त नहीं हो जाती। नियति के समक्ष पूरी तरह समर्पित हो जाना, मानवीय प्रकृति के विरुद्ध है। स्वतंत्रता के प्रति आकर्षण मनुष्य का स्वभाव है। वह परतंत्रता के विरुद्ध संघर्ष करता ही रहता है।
क्योंकि-- पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।।
अतः पुरुषार्थी व स्वातन्त्र्यप्रेमी ब्यक्ति सरलता से भाग्य के समक्ष सिर नहीं झुकाता है। अतः स्वतंत्रता और परतंत्रता का यह संघर्ष चलता रहता है।
उसमें सफलताओं और विफलताओं का दौर आता जाता रहता है। उसे थककर रुकना भी पड़ता है। उस समय नियति की स्वीकृति भी आवश्यक है। दिन भर संघर्षरत योद्धा भी तो रात्रि के समय निष्क्रियता का सहारा लेता है। निष्क्रियता और गाढ़ी नींद से उसे दूसरे दिन पुनः संघर्ष करने की क्षमता प्राप्त होती है। पराजय और निराशा के क्षणों में नियति की स्वीकृति भी व्यक्ति को समग्र निराशा से बचाती है।
क्योंकि नियतिवादी धारणा, यह आश्वासन भी प्रदान करती है कि पराजय शाश्वत वस्तु नहीं है। पुनः सफलता और विजय का आगमन भी अवश्यंभावी है। रहीम न उतार चढ़ाव के क्षणों को देखकर ही लिखा था--
रहिमन चुप ह्वै बैठिए,देखि दिनन को फेर।
जब नीके दिन आइहैं,बनत न लगिहैं देर।।
रामचरितमानस के कई प्रसंगों में यह मनोवैज्ञानिक स्वरूप देखने को मिलता है।
शिव ने सती को तर्क,चेतावनी, व्यंग्य सभी विधाओं में समझाने की चेष्टा की, सती के साथ परीक्षा के समय न जाकर क्रियात्मक रूप में भी विरोध किया। किन्तु इतना होने पर भी सती अपने ही मार्ग पर चल पड़ीं। ऐसी स्थिति में भगवान शिव को नियति की अपरिहार्यता का स्मरण आना और यह कहना कि--
होइहैं सोइ जो राम रचि राखा ....स्वाभाविक था।
नियति की प्रबलता देखकर ब्यक्ति झुँझला उठता है कि,नियति का कुचक्र रचकर नचाने वाला कौन है? नियति का निर्माण भी ब्यक्ति के अपने कर्मों से होता है, इस उत्तर से वह भले ही मूक हो जाय, किन्तु उसके दुख और निराशा का निराकरण नहीं होता।
भगवान राम के बाण से आहत बालि ने, कठोर स्वर में उनपर आरोप लगाते हुए पूछ ही तो लिया कि ईश्वर होते हुए भी आपने मुझमें और सुग्रीव में भेद क्यों किया? धर्म रक्षा के लिए अवतार लेने पर भी आपने मुझ पर छिपकर वार क्यों किया?
धर्म हेतु अवतरेउ गोसाईं। मारेहु मोहिं ब्याधि की नाईं।
मैं बैरी सुग्रीव पियारा। कारन कवन नाथ मोहिं मारा।।
प्रभु की ओर से उतना ही कड़ा उत्तर प्राप्त हुआ--
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या-सम ये चारी।
इन्हहिं कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधे कछु पाप न होई।।
प्रभु ने कहा कि अपराधी के समक्ष आकर युद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। न्यायाधीश दंड देता है, युद्ध नहीं करता।वृक्ष की आड़ में छिपकर बाण चलाने का प्रतीकात्मक तात्पर्य भी यही था।
विनयपत्रिका में गोस्वामीजी ने वृक्ष को कर्म के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है--
संसार कान्तार अति घोर गम्भीर बन गहनतम कर्म-संकुल मुरारी।
इसका अर्थ यह है कि ईश्वर भी दंड की ब्यवस्था कर्म को ही आगे रखकर करता है। बालि ने पुरुषार्थ से सुग्रीव को परास्त कर दिया था, किन्तु उस नियति पर उसका क्या बल था, जो वाण के माध्यम से वृक्ष के पीछे से आकर उसकी विजय को पराजय में बदल देती है।
बालि इस सिद्धान्त के सामने निरुत्तर था, किन्तु उसने विजय का एक मार्ग ढूँढ़ निकाला उसका उत्तर था कि यदि केवल बाण ही मुझे लगा होता, तो उत्तर प्रति उत्तर का प्रश्न ही कहाँ था?
किन्तु जब बाण चलाने वाला सामने हो, और उसके विषय में यह सुन रखा हो कि वह पतित पावन है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उस ईश्वर के दर्शन के बाद भी क्या मेरे पाप अभी समाप्त नहीं हुए?
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी,अंतकाल गति तोरि।।
अगले ही क्षण भगवान का कोमल कर-कमल बालि के मस्तक पर था। प्रभु ने बालि को अमरता का आश्वासन देना चाहा--
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी। अचल करौं तन राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।
किन्तु बालि इसे स्वीकार करने की मुद्रा में नहीं था। उसे केवल प्रभु के कर कमलों में ही नहीं, बाण के प्रहार में भी करुणा का साक्षात्कार हो रहा था। यही जीवन का यथार्थ सत्य है। अज्ञात नियति के प्रहार से विक्षुब्ध व्यक्ति भी उस समय शान्त हो जाता है जब उसे उसके पीछे ईश्वर का हाथ दिखाई देता है।
भगवान शंकर भी नियति के पीछे प्रभु का ही हाथ देखते हैं और तब तर्क, वितर्क का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। प्रभु के मंगल मय विधान के द्वारा जो भी होगा, वह कल्याणकारी ही होगा। उमा विवाह के अवसर पर शिव को देखकर, मयना कहती हैं--
जो फल चहिहिं सुरतरुहि सो बरबस बबूरहिं लागई।।
यानी कल्पवृक्ष में लगने वाले फल को बलात् बबूल के वृक्ष में लगाने वाले श्रृष्टिकर्त्ता का विधान त्रुटिपुर्ण है। वृक्ष और फल की अनुरूपता का गणित यथार्थ नहीं होता। गुलाब की कटीली झाड़ियों के बीच यह कल्पना करना कठिन हो जाता है कि इसमें सुकुमार और सौरभ युक्त पुष्प प्रस्फुटित होने वाला है। एक प्रसिद्ध कहानी इसे स्पष्ट करती है।
आम्र के नीचे लेटने वाला पथिक सोच रहा था कि कुम्हणे के विशाल फल का निर्माण असहाय लता के द्वारा और आम्र के विशाल वृक्ष में आम के छोटे रसीले फल, श्रृष्टि निर्माता की बुद्धि का उपहास करते हैं।
तब तक अचानक आम का फल उसके सर पर टपक कर गिर पड़ा, तब वह ब्रह्मा की बुद्धिमत्ता की दाद देने लगा, कि यदि आम का फल विशाल होता तो मेरी खोपड़ी चकनाचूर हो जाती।
वस्तुतः श्रृष्टि में अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनका समाधान सर्वथा असंभव है। यहीं आकर व्यक्ति या तो नास्तिक हो जाता है अथवा--अति बिचित्र भगवंत गति, को जग जानन जोग।
कहकर मौन हो जाता है।
जिसका समाधान हमारी बुद्धि के द्वारा संभव नहीं है। इसलिए श्रृष्टि में जैसा है, उसे समग्र रूप से वैसा ही स्वीकार कर लेना सच्ची विवेक बुद्धि का परिचायक है। उसे अस्वीकार करना दुख को निमंत्रण देना है।
जिसे हम पुरुषार्थ के द्वारा परिवर्तित कर सकें, उसे बदलने का प्रयास करते हुए भी बहुत कुछ ऐसा बचा रहेगा कि जिसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने में शान्ति की उपलब्धि हो सकती है।इसी को चिन्तकों ने नियति और भाग्य कहकर पुकारा है।
यथार्थ को सहन करने की शक्ति,उसे वरदान के रूप में स्वीकार करने का भाव ही श्रेष्ट है।
मैना की ब्यथा को हल्का करने के लिये,पार्वती ने इसी तर्क प्रणाली का आश्रय लिया--
जनि लेहु मातु कलंक करुना परिहरहु अवसर नहीं।
दुख सुख जो लिखा लिलार हमरे जाब जहँ पाउब तहीं।।
इसीलिए गीता में भी - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
को संस्थापित किया गया।
जय वैदिक सनातन धर्मस्य 🔱🏹🪈🚩
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