रावण के द्वारा रचे गए यें शास्त्र !



ब्रह्माजी के पुत्र पुलस्त्य ऋषि हुए। उनका पुत्र विश्रवा हुआ। विश्रवा की पहली पत्नी भारद्वाज की पुत्री देवांगना थी जिसका पुत्र कुबेर था। 

विश्रवा की दूसरी पत्नी दैत्यराज सुमाली की पुत्री कैकसी थी जिसकी संतानें रावण, कुंभकर्ण और विभीषण थीं। 

रावण अपने युग का प्रकांड पंडित ही नहीं वैज्ञानिक भी था। आयुर्वेद, तंत्र और ज्योतिष के क्षेत्र में उसका योगदान महत्वपूर्ण हैं। इंद्रजाल जैसी अथर्ववेद मूलक विद्या का रावण ने ही अनुसंधान किया। 

उसके पास सुषेण जैसे वैद्य थें, जो देश विदेश में पाई जानें वाली जीवन रक्षक औषधियों की जानकारी स्थान, गुण धर्म आदि के अनुसार जानतें थें। रावण की आज्ञा से ही सुषेण वैद्य ने मूर्छित लक्ष्मण की जान बचाई थी।
 
रावण के बारे में वाल्मीकि रामायण के अलावा पद्मपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, कूर्मपुराण, महाभारत, आनंद रामायण, दशावतारचरित आदि हिन्दू ग्रंथों में उल्लेख मिलता हैं।
  
शिव का परम भक्त, यम और सूर्य तक को अपना प्रताप झेलने के लिए विवश कर देने वाला, प्रकांड विद्वान रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ साथ बहु विद्याओं का जानकार था। 

उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह तरह के जादू जानता था। यह भी उल्लेख मिलता और कहा जाता हैं कि रावण ने कई शास्त्रों की रचना की थी। आओ जानते हैं कि वे कौन कौन से शास्त्र थें।
  
शिव तांडव स्तोत्र : 

रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की। रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा, तो भगवान शिव ने अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुए कहने लगा- 'शंकर-शंकर'- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में 'शिव तांडव स्तोत्र' कहलाया।
 
अरुण संहिता : 

संस्कृत के इस मूल ग्रंथ का अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका हैं। मान्यता हैं कि इस का ज्ञान सूर्य के सार्थी अरुण ने लंकाधिपति रावण को दिया था। यह ग्रंथ जन्म कुण्डली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का मिश्रण हैं।
 
रावण संहिता : 

रावण संहित जहां रावण के संपूर्ण जीवन के बारे में बताती हैं वहीं इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियों का भंडार हैं।
 
चिकित्सा और तंत्र के क्षेत्र में रावण के ये ग्रंथ चर्चित हैं- 
1. दस शतकात्मक , अर्कप्रकाश 
2. दस पटलात्मक , उड्डीशतंत्र 
3. कुमारतंत्र और 
4. नाड़ी परीक्षा।

रावण के ये चारों ग्रंथ अद्भुत जानकारी से भरे हैं। रावण ने अंगूठे के मूल में चलने वाली धमनी को जीवन नाड़ी बताया हैं, जो सर्वांग स्थिति व सुख-दु:ख को बताती हैं। 
रावण के अनुसार औरतों में वाम हाथ एवं पांव तथा पुरुषों में दक्षिण हाथ एवं पांव की नाड़ियों का परीक्षण करना चाहिएं।
 
अन्य ग्रंथ : 

ऐसा कहते हैं कि रावण ने ही अंक प्रकाश, इंद्रजाल, कुमारतंत्र, प्राकृत कामधेनु, प्राकृत लंकेश्वर, ऋग्वेद भाष्य, रावणीयम, नाड़ी परीक्षा आदि पुस्तकों की रचना की थी।
 
इसी प्रकार शिशु-स्वास्थ्य योजना का विचारक 'अर्कप्रकाश' को रावण ने मंदोदरी के प्रश्नों के उत्तर के रूप में लिखा है। इसमें गर्भस्थ शिशु को कष्ट, रोग, काल, राक्षस आदि व्याधियों से मुक्त रखने के उपाय बताए गए हैं। 

'कुमारतंत्र' में मातृकाओं को पूजा आदि देकर घर-परिवार को स्वस्थ रखने का वर्णन है। इसमें चेचक, छोटी माता, बड़ी माता जैसी मातृ व्याधियों के लक्षण व बचाव के उपाय बताए गए हैं।
 
रावण पर रचना : 

पुराणों सहित इतिहास ग्रंथ वाल्मीकि रामायण और रामचरित रामायण में तो रावण का वर्णन मिलता ही है किंतु आधुनिक काल में आचार्य चतुरसेन द्वारा रावण पर 'वयम् रक्षामः' नामक बहुचर्चित उपन्यास लिखा गया हैं। 

इसके अलावा पंडित मदनमोहन शर्मा शाही द्वारा तीन खंडों में 'लंकेश्वर' नामक उपन्यास भी पठनीय हैं।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्  🚩

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