" गांधी वध और ग्वालियर "

महात्मा गांधी की हत्या के आरोपियों को ग्वालियर के कई लोगों ने मदद की थी। 

नाथूराम गोडसे ने यहां स्वर्ण रेखा नदी के किनारे पिस्टल से निशाना साधने की प्रैक्टिस की थी। गोडसे ग्वालियर इसीलिए आए, क्योंकि यह शहर हिंदू महासभा का गढ़ था।

30 जनवरी 1948 को दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर महात्मा गांधी की हत्या की थी। 

यहां की निशानेबाजी की प्रैक्टस, कर दी बापू की हत्या
गोडसे को पिस्टल दिलाने से लेकर हर तरीके से मदद ग्वालियर के ही डॉ.दत्तात्रेय परचुरे ने की थी। 

पिस्टल से हमला कारगर होगा या नहीं, इसकी जांच के लिए शिंदे की छावनी स्वर्ण रेखा नदी के किनारे गोडसे सहित सभी आरोपियों ने मिलकर प्रैक्टिस की। 

इस स्थान पर पहले डॉ.परचुरे का मकान था। बाद में परचुरे परिवार ग्वालियर में दूसरे स्थान पर शिफ्ट हो गया।

हिंदू महासभा के ग्वालियर प्रमुख जयवीर भारद्वाज बताते हैं कि गोडसे इसलिए ग्वालियर आए, क्योंकि यह शहर महासभा की गतिविधियों का एक प्रमुख केन्द्र था। 

उस समय डॉ. परचुरे ने हिंदू राष्ट्र सेना भी बनाई थी और वे हिंदू महासभा के साथ पूरी तरह सक्रिय रहते थे। उन्हीं के सहयोग से गोडसे ने पिस्टल को खरीदा था।

पिस्टल लेने के बाद और उसको चलाने की प्रैक्टिस की जरूरत महसूस हुई। यह तय किया गया कि डॉ. परचुरे के घर के पीछे वाले स्थान पर यह रिहर्सल की जाए। 

घर के पीछे स्वर्ण रेखा नदी बहती थी। 67 साल पहले यह स्थान वीरान हुआ करता था। भारद्वाज बताते हैं कि उन्हें ज्यादा तो याद नहीं, लेकिन महासभा के कार्यकर्ताओं के मुताबिक तीन-चार फायर पिस्टल से किए गए। 

जब सब कुछ उम्मीद के मुताबिक निकला तो वे आप्टे के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद पुलिस ने ग्वालियर में डॉ. परचुरे को हिरासत में लिया। 

डॉ. परचुरे के साथ गंगाधर दंडवते, गंगाधर जाधव और सूर्यदेव शर्मा को भी गिरफ्तार किया। 

डॉ. दत्तात्रेय के पुत्र उपेन्द्र, जो स्वयं ही होम्योपैथिक डॉक्टर हैं, कहते हैं कि उस समय वह 18 साल के थे, अब वे केवल लोगों इलाज कर समाजसेवा कर रहे हैं।

जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩

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