" स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी हिमालयीवासी दादा गुरु "

रोचक तथ्य हिमालयवासी दादा गुरु स्वामी सर्वेश्वरानन्द जी
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यों तो हिमालयवासी इस कालजयीसत्ता की आयु 800 वर्ष आँकी जाती है, पर वस्तुतः वे दो हजार से अधिक वर्षों से तपश्चयार्रत हैं और लोकमंगल के कार्यों में संलग्न हैं । 

यह आकलन 'दिव्य' द्रष्टाओं का है । 

परम पूज्य गुरुदेव की इस सूक्ष्म मागदशर्क सत्ता के सम्बन्ध इस्लाम धर्म का एक ग्रन्थ है-'तजकर रसुल गोशिया' जो पट्शिष्य श्री गुलहसन ने लिखा है । यह पुस्तक आज भी श्री दीपसिंह हिम्मतसिंह राज लोटा, पो आंकलाव, गुजरात में उपलब्ध है । 

इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 48 पर दादागुरु रूपी सूक्ष्म शरीर सत्ता का स्पष्ट उल्लेख है कि 150 वर्ष पूर्व श्री गुलहसन शाह की मुलाकात स्वामी श्री श्रवणनाथ के माध्यम से हरिद्वार में श्री सर्वेश्वरानन्द जी से हुई थी। 

वे इच्छानुसार जब चाहते अपना वयोवृद्धा छोड़कर 12  वर्ष के बालक बन जाते थे। उनके अनेकानेक दृश्य चमत्कारों का वर्णन श्रीशाह ने किया है।

वस्तुतः ऐसे सन्तों की आयु का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। वे चमत्कारों को देखने की ललक में आतुर सामान्य व्यक्तियों की भीड़ देख स्वयं ही सूक्ष्म शरीरधारी हो दुर्गम हिमालय प्रस्थान कर जाते हैं। 

मात्र समष्टिगत हित हेतु अपने सुपात्रों का चयन करने भूलोक पर आवागमन करते रहते हैं। भूख, प्यास आदि लौकिक बंधनों से वे मुक्त होते हैं।

पायलट बाबा रचित ग्रन्थ 'हिमालय कह रहा है' (1982) में पृष्ठ 145, 236, 571, 572, 587, 589 पृष्ठों पर विस्तार से योगीराज श्री सर्वेश्वरानन्द जी का उल्लेख आया है । 

स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अपनी गुरुसत्ता के दृश्यरूप के सम्बन्ध में कभी कुछ न लिखा, न कहा। अपने हर कार्य को उनके मागर्दशर्न में सम्पन्न वे मानते थे। अपने हर कार्य का, उपलब्धि का श्रेय सदैव परोक्ष सत्ता को देते थे। 

यह विनम्रता भी हो सकती है वह महामानव के रूप में स्वयं श्रेय न लेने की उनकी नीति भी, किन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस प्रकाशपुंज ने उनके जीवन के पन्द्रहवें वसंत में साक्षात्कार किया था, वह निश्चित ही उनकी गुरुसत्ता थी, जो उनकी ही तलाश में थी व उस पावन दिन उनसे एकाकार हो उन्हें विलक्षण अवतारी सत्ता बना गई।

एक गायत्री परिजन की अनुभूति के माध्यम से ऊपर व्यक्त किए गए कथन को स्पष्ट करना चाहेंगे। स्वयं गुरुदेव कहते थे कि हमारी मार्गदर्शक सत्ता सदैव हमारे साथ रहती है व हमारे आगे पायलट की तरह चलती रहती है। 

उसी सत्ता को, जिसे हम सभी दादागुरु कहकर पुकारते हैं, देखने की जिज्ञासा नवसारी (गुजरात) के श्री मगन भाई गाँधी ने की। गुरुदेव ने कहा कि ''मुझे देखकर मेरे ही अन्दर उनकी अनुभूति कर लें, किन्तु वे जिद पर अड़े रहे । 

अंततः पूज्य गुरुदेव ने उत्तरकाशी में अमुक स्थान पर, अमुक रूप में, अमुक दिन उनके अन्न क्षेत्र में दिखाई देने की बात बताई और कहा कि इसके बाद गहराई में मत जाना। वे मन्तव्य समझ नहीं पाए। उत्तरकाशी में बताए गये दिन वे प्रतीक्षा करते रहे। जैसी शक्ल बतायी गयी थी, उसी शक्ल के धवल केशधारी बाबा प्रकट हुए, सफेद वस्त्रों में और भिक्षा ली व गंगा किनारे नीचे तेजी से उतर गए। 

मगन भाई ने पीछा किया। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इतनी तीव्र गति से चलकर वे किधर निकल गए। वे एक कंदरा के समक्ष खड़े चारों ओर दृष्टि दौड़ाने लगे, तभी झाड़ी के पीछे से कुछ आवाज आई। पहुँचे तो देखा वे ही श्वेत केशधारी बाबा बैठे हैं, किन्तु यह क्या जैसे ही उन्होंने अपना स्मित मुखमण्डल मगन भाई की ओर किया वे देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि ये तो अपने गुरुदेव स्वयं पं श्रीराम शर्मा आचार्य, जिनसे वे कोठरी में 5 दिन पूर्व मुलाकात कर सारा अता-पता नोट करके लाए थे। 

गुरुदेव ने कहा ''अब तो विश्वास हुआ कि मैं व मेरी गुरुसत्ता एक ही हैं। अब आगे से अविश्वास न करना, न ही संत बाबाओं के पीछे भागना।'' इतना कहकर वे अन्तर्ध्यान हो गए।

सारी यात्रा छोड़कर मगन भाई वापस हरिद्वार लौटे, बार-बार गुरुदेव के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगी व कहा कि मुझ नादान को सजा दीजिए, क्योंकि उसने गुरुसत्ता पर अविश्वास किया । गुरुदेव ने प्यार से समझा भर दिया, समाधान हो गया ।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्  🚩
वैदिक सनातन धर्म की जय 🔱🏹🪈🚩

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