एक राम दशरथ का बेटा एक राम घट-घट में बैठा,
एक राम का सकल पसारा एक राम सबहूँ ते न्यारा !
कबीर दास जी के इस दोहै का दुरुपयोग करके पिछली पांच शताब्दीयों में कितने पंथ बने और लुप्त हुए गिनती नहीं
पर सगुण उपासकों का उपहास उड़ने में इसका दुरुपयोग आज भी निरंतर जारी है।
एक बार कबीरदास जी अपनी मौज में बैठे बुनाई कर रहे थे !
साथ-साथ ही प्रभु की महिमा भी गा रहे थे !
तभी उनके मुँह से एक दोहा निकला -
एक राम दशरथ का बेटा एक राम घट-घट में बैठा,
एक राम का सकल पसारा एक राम सबहूँ ते न्यारा !
उनके शिष्यों ने जब यह सुना तो इस दोहे का अनर्थ ही कर डाला ;
कहने लगे कि चार अलग-अलग राम हैं !
एक राम वे जो दशरथ के बेटे थे !
दूसरे राम वे जो सबके घट में बैठे हैं !
तीसरे राम वे जिनका सारे संसार में विस्तार है जो सर्वव्पापी है सृष्टि के कण-कण में विराजमान है !
चौथे राम वे हैं जो सबसे न्यारे हैं !
अब सभी शिष्य इनमे से एक-एक राम को चुनने लगे !
जब कबीर जी तक यह बात पहुंची तो वे हंसने लगे सभी शिष्यों को पास बुलाया और समझाया - अरे नादानों ये राम चार अलग-अलग नहीं हैं;
एक ही हैं !
मात्र; सत्ता के अलग अलग गुण हैं !
जेसे व्यक्ति एक ही है पर वो भी
किसी का पिता है किसी का पुत्र है,
किसी का भाई है किसी का साला है,
किसी का चाचा है किसी का मामा हैं,
किसी का बाबा है किसी का नाना है...
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