" ध्रुव स्तम्भ या कुतुब मीनार "

कुतुब मीनार को इस्लाम के जन्म से बहुत पहले चौथी सदी के महान शासक चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक वराहमिहिर ने बनवाया था। 

इतिहास के मशहूर गणितज्ञ और खगोलविद वराहमिहिर ने ग्रहों की गति के अध्ययन के लिए विशाल स्तंभ का निर्माण करवाया, जिसे ध्रुव स्तंभ या मेरु स्तंभ कहा जाता था। 

उस परिसर में कभी 27 नक्षत्रों के प्रतीक के तौर पर 27 मंदिर भी हुआ करते थे। ये मंदिर जैन तीर्थंकरों के साथ ही भगवान विष्णु व शिव और गणेश जी के मंदिर थे।
   
प्रसिद्ध खगोलविद वराह मिहिर द्वारा स्थापित एक वेधशाला का अवलोकन टॉवर था। ऐसा अनुमान है कि इस वेधशाला की स्थापना चौथी शताब्दी ईस्वी से छठी शताब्दी ईस्वी के दौरान की गई थी। 

वेधशाला ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख शोध प्रदान किया, जहां ग्रहों और सितारों की गति के बारे में कई गणनाएं की गईं और वैदिक सिद्धांतों को मान्य किया गया। 

यह निर्णायक सबूत किसी भी वैसे सिद्धांत या अटकलों को समाप्त कर देते हैं कि यह टावर कभी किसी मुस्लिम आक्रमणकारी द्वारा बनाया गया था। 

उन्होंने केवल हमारी प्राचीन स्थापत्य और वैज्ञानिक विरासत को नुकसान पहुंचाने, विकृत करने और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को बर्बाद करने में अपनी भूमिका निभाई तथा परिवर्तन और विकृतिकरण के इस घनघोर कृत्य को अंज़ाम दिया।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् 🚩

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