सत्यभामा कैसे बनी भगवतद्पत्नी !!!



एक बार भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा... 

“प्राणनाथ ! मैंने पूर्वजन्म में कौन सा दान, तप अथवा व्रत किया था जिससे मैं मर्त्यलोक में जन्म लेकर भी मर्त्य भाव से ऊपर उठ गयी और मुझे आपकी प्रिय अर्धांगिनी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ?”

श्रीकृष्ण ने कहाः “प्रिये ! हरिद्वार में वेद-वेदांगों के पारंगत देवशर्मा नामक एक धर्मात्मा ब्राह्मण रहते थे। 

उन्होंने अपनी पुत्री गुणवती का विवाह अपने शिष्य चन्द्र से कर दिया। 

एक दिन वे गुरु-शिष्य समिधा (हवन हेतु लकड़ी) लाने वन में गये। वहाँ एक भयँकर राक्षस ने उन्हें मार डाला।

यह समाचार सुन गुणवती शोक से विलाप करने लगी। किसी तरह धीरे-धीरे उसने अपने को स्वस्थ किया। 

फिर वह सत्य, शौच (आंतर-बाह्य पवित्रता) आदि के पालन में तत्पर रहने लगी। 

उसने जीवनभर एकादशी और कार्तिक मास के व्रत का विधिपूर्वक पालन किया।

प्रिये ! ये दोनों व्रत मुझे बहुत प्रिये हैं। ये पुत्र और सम्पत्ति के दाता तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। 

धीरे-धीरे गुणवती की अवस्था अधिक होती गयी। उसके अंग शिथिल हो गये और ज्वर से भी पीड़ित रहने लगी लेकिन उसका गंगा-स्नान का नियम था। 

ऐसी अशक्तावस्था में भी वह किसी तरह स्नान के लिए गयी। 

ज्यों ही जल के भीतर उसने पैर रखा, त्यों ही शीत की पीड़ा से वह काँप उठी और वहीं पर गिर पड़ी तथा उसका शरीर छूट गया।

तभी मेरे पार्षद आये और विमान में बैठा कर चँवर डुलाते हुए उसे वैकुण्ठ ले गये। 

हे प्रिये ! कार्तिक-व्रत के पुण्य और भगवद्-भक्ति से ही उसे मेरा सान्निध्य मेरा प्राप्त हुआ।

हे देवी ! अब रहस्य की बात सुनो...

देवताओं की प्रार्थना करने पर मैंने जब पृथ्वी पर अवतार धारण किया तो मेरे पार्षद भी मेरे साथ आये। 

तुम्हारे पिता देवशर्मा अब सत्राजित हुए हैं और तुम ही पूर्वजन्म की गुणवती हो। 

पूर्वजन्म में कार्तिक-व्रत के पुण्य से तुमने मेरी प्रसन्नता को बहुत बढ़ाया है। 

वहाँ तुमने मेरे मंदिर के द्वार पर जो तुलसी की वाटिका लगा रखी थी, इसी से तुम्हारे आँगन में आज देव-उद्यान का कल्पवृक्ष शोभा पा रहा है। 

पूर्वजन्म के कार्तिक मास के दीपदान से ही तुम्हारे घर में स्थिर लक्ष्मी और ऐश्वर्य प्रतिष्ठित है। 

तुमने अपने व्रत आदि सभी कर्मों को भगवान को निवेदित (समर्पित) किया था, उसी पुण्य से तुम मेरी अर्धांगिनी हुई हो। 

मृत्युपर्यंत तुमने जो कार्तिक-व्रत का अनुष्ठान किया, उसके प्रभाव से तुम्हारा मुझसे कभी वियोग नहीं होगा। 

इसी प्रकार अन्य जो भी स्त्री पुरुष कार्तिक व्रतपरायण होते हैं वे मेरे समीप आते हैं।

साभार :- अश्वमेघ भारत

श्रीकृष्णं वंदे जगद्गुरुम् 🪈 🚩

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