शंकराचार्य महज 2 वर्ष की आयु में इन्हें कंठस्थ थे वेदांत
3 वर्ष की अवस्था में मलयालम भाषा का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे।
अद्वैत वेदान्त, वेदान्त की एक शाखा है, जिसका अर्थ है 'अहं ब्रह्मास्मि' यानी अद्वैत वेदांत भारत में प्रतिपादित दर्शन की कई विचारधाराओं में से एक है, जिसकी शुरुआत आदि शंकराचार्य ने की थी। दरअसल शंकराचार्य एक उपाधि है जिनका मानना है कि संसार में ब्रह्म ही सत्य है।
बाकी सब मिथ्या ( झूठ) है। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र में 'अहं ब्रह्मास्मि' ऐसा कहकर अद्वैत सिद्धांत बताया है।
आद्य शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता थे। उनकी यानी वैशाख शुक्ल पंचमी जयंती होती है।
आदि गुरू शंकराचार्य का जन्म केरल के कालडी़ नामक ग्राम मे हुआ था। वह अपने ब्राह्मण माता-पिता की एकमात्र संतान थे। बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया।
शंकर की रुचि आरम्भ से ही संन्यास की तरफ थी। अल्पायु मे ही आग्रह करके माता से सन्यास की अनुमति लेकर गुरु की खोज मे निकल पडे।
जिस समय जगद्गुरु शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ, उस समय भरत में वैदिक धर्म मलिन हो रहा था, ऐसे में आचार्य शंकर मानव धर्म के भास्कर प्रकाश स्तम्भ बनकर प्रकट हुए।
महज 32 वर्ष के जीवन काल में उन्होंने सनातन धर्म को ऐसी ओजस्वी शक्ति प्रदान की कि उसकी समस्त मूर्छा दूर हो गई।
शंकराचार्य 3 वर्ष की अवस्था में मलयालम भाषा का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे। इनके पिता चाहते थे कि ये संस्कृत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। परंतु पिता की अकाल मृत्यु होने से शिशु अवस्था में ही शंकर के सिर से पिता की छत्रछाया उठ गई और सारा बोझ शंकर जी की माता के कंधों पर आ पड़ा।
लेकिन उनकी माता ने कर्तव्य पालन में कमी नहीं रखी। 5 वर्ष की अवस्था में इनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर वेदों का अध्ययन करने के लिए गुरुकुल भेज दिया गया।
आद्य शंकराचार्य बचपन से ही प्रतिभा संपन्न थे, इस तरह इनकी प्रतिभा से इनके गुरु भी बेहद चकित थे। बालक शंकर ने महज 2 वर्ष के समय में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए।
आद्य शंकराचार्य विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिसके अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है।
भारतीय प्राच्य परम्परा में आद्य शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। उनके जीवन के चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे। शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का हम दर्शन कर सकते हैं।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् 🚩
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