" जम्बूद्वीपे आर्यावर्ते भारतवर्षे "

कैसे जम्बूद्वीप का आर्यावर्त बना भारत? हमारे देश को उसका नाम कैसे मिला?

सनातन काल में जंबूद्वीप में स्थित था आर्यावर्त । “आर्य” का अर्थ है “ज्ञानी” और “वर्त” क अर्थ है “निवास स्थान” यानी परम ज्ञानी जहाँ निवास करते थे उस प्रदेश को आर्यावर्त कहते थे। आर्यावर्त उप महाद्वीप को ‘भरतखंड’ या ‘भरत भूमी’ भी कहा जाता है। इस उप महाद्वीप के पहले चर्क्रवर्ती थे भरत महाराज। भरत चर्क्रवर्ती के नाम से इस उपखंड का नाम पड़ा भारत। सनातन भारत आज जितना छॊटा नहीं अपितु बहुत बड़ा भूभाग था।

पुराणों और वेदों के अनुसार धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बू द्वीप सभी द्वीपों के बीचोबीच स्थित है। जम्बू द्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। जम्बू (जामुन) वृक्ष के इस द्वीप पर अधिक मात्रा में पाए जाने के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था।

जम्बूद्वीप का अर्थ है संपूर्ण एशिया खंड। रशिया से श्रीलंका और इसराइल से चीन तक फैला जम्बूद्वीप इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इनमें भारतवर्ष ही मृत्युलोक है, शेष देवलोक हैं। इसके चतुर्दिक लवण सागर है। इस संपूर्ण नौ खंड में इसराइल से चीन और रूस से भारतवर्ष का क्षेत्र आता है। जम्बू द्वीप में प्रमुख रूप से 6 पर्वत हैं:- हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान। वेदों में उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है। आर्यभूमि का विस्तार काबुल की कुंभा नदी से भारत की गंगा नदी तक था। मान्यता है की हर काल में आर्यावर्त का क्षेत्रफल अलग-अलग रहा।

महाभारत में विश्वामित्र और मेनका की एक कहानी आती है। मेनका स्वर्ग से भूलोक आती है और विश्वामित्र की तपस को भंग कर उनसे विवाह करती है। उन दोनों की एक पुत्री होती है जिसका नाम है शकुन्तला देवी। देवी शकुन्तला को कन्व ऋषी ने पाल पॊस कर बड़ा किया था। शकुन्तला देवी जब वयस्क हो जाती है तो वह राजा दुष्यंत के प्रेम में पड़जाती है और दोनों गंधर्व विवाह करते है।

पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुन्तला के पुत्र भरत की गणना ‘महाभारत’ में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। मान्यता है कि राजा भरत के नाम से ही आर्यावर्त का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। भरत का एक नाम ‘सर्वदमन’ भी था क्योंकि इसने बचपन में ही बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन किया था। और अन्य समस्त वन्य तथा पर्वतीय पशुओं को भी सहज ही परास्त कर अपने अधीन कर सर्वदमन नाम से प्रचल्लित थे। अपने जीवन काल में उन्होंने यमुना, सरस्वती तथा गंगा के तटों पर क्रमश: सौ, तीन सौ तथा चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। प्रवृत्ति से दानशील तथा वीर थे। राज्यपद मिलने पर भरत ने अपने राज्य का विस्तार किया। प्रतिष्ठान के स्थान पर हस्तिनापुर को राजधानी बनाया। जॊ भी राज्य भरत के साम्राज्य में आये उसे भरत भूमी कहा गया।

आर्यावर्त के भरत , पहले चक्रवर्ती के रूप में उभर कर आते हैं जिस कारण इस उप महाद्वीप का नाम भरत भूमी या भरत वर्ष हो जाता है। यधपि यही भूभाग आगे चलकर भारत नाम से जाना गया। जानकार कहते हैं की मौर्य साम्राज्य के काल तक इस भूभाग को आर्यावर्त नाम से ही बुलाया जाता था। स्वयं चाणक्य ने जब भी भारत का उल्लेख किया तब उसे आर्यावर्त ही कहकर संबोधित किया ऐसा जानकार कहते हैं। भरत वर्ष में व्यापार के लिए आए ग्रीकों ने सिन्धु प्रांत में रहनेवालों को हिन्दू कहना शुरु किया क्यों की वे सिन्धू शब्द का उच्चारण नहीं कर सकते थे। इसी कारण आर्यावर्त को हिन्दुस्तान कहा गया। तात्पर्य सिन्धू नदी तट के उस पार रहने वाली जनांग। देश में अंग्रेज़ों के शासन के बाद फिर से नाम बदल दिया गया। जाते जाते अंग्रेज़ों ने हमारे भारत को एक नया अंग्रेज़ी नाम ‘इंडिया’ दे दिया जिसका कॊई अर्थ ही नहीं है।

वेद पारंगत ज्ञानी कहते हैं की हिन्दू शब्द का प्रयॊग ग्रीक और मुघलॊं ने प्रारंभ किया था उनका कहना है की तकनीकी रूप से हिन्दु शब्द का अर्थ नहीं है। काल के कपाल से गुजरते हुए जंबूद्वीप में स्थित आर्यावर्त का भारत छॊटॆ छॊटॆ टुकडॊं में बँटता गया। भरत खंड जो की कभी एक हुआ करता था वह जाति और भाषा के आधार पर अनेक देश के रूप में बंटता गया। भरत चक्रवर्ती से लेकर चंद्रगुप्त के काल तक जो कभी अखंड भारत हुआ करता था वह टुकड़ों में बंट कर आज का भारत रह गया जिसे और टुकड़ों मे तोड़ने की कोशिश की जा रही है। अगर इसी तरह चलता रहा तो मुट्ठी भर ज़मीन के टुकडे को ही भारत कहना पड़ेगा ।

हमारे देश का अपना ही एक नाम है ‘भारत’ जो सनातन काल से ही देवी-देवता, ऋषि -मुनि, परम ज्ञानी पवित्र आत्माओं का निवास स्थान था। इसे भारत कह कर बुलाना ही उचित होगा। विदेशी नाम जिनका कॊई अर्थ ही न हो उस नाम से हमारे देश को संबोधित करना सही नहीं होगा। इस पुण्य भूमी को हम अपनी माता के रूप में देखते हैं इसीलिए तो हम “भारत माता की जय” कहते हैं।

जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् 🚩

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