" जनरल ज़ोरावर सिंह कहलूरिया "

" जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया "

जिसने लद्दाख जीत कर जम्मू में मिलाया...

बिलासपुर थी इस शूरवीर की जन्मभूमि...

जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया ने लद्दाख को जीत कर जम्मू में मिलाया था। वह जम्मू के राजा का जनरल था। उसके नेतृत्व में जम्मू की सीमाओं का विस्तार दूर दूर तक हुआ था। राजा गुलाब सिंह उसकी शूरवीरता से इतना प्रभावित था कि उसने कहलूर के इस वीर योद्धा को जनरल की उपाधि से सुशोभित किया। 

सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शक्ति सिंह चंदेल ने अपनी पुस्तक "कहलूर बिलासपुर थ्रू द सैंचरीज़" में जनरल जोरावर सिंह कहलूरिया बारे विस्तार से लिखा है। वे लिखते हैं कि जोरावर सिंह कहलूर रियासत के राजा महाचंद के वजीर रामू जो कि बैरी दड़ोल का वजीर था, का पोता था। 

सरदारु उसके पिता का नाम हो सकता है जोकि बाद में वजीर बना था। बाद में रानी नागर देवी ने उस की जगह बैरागी राम को वजीर बनाया था। कहते हैं कि जब जोरावर सिंह एक साल का था तब राजा बिलासपुर के पास कोई बहुत ही विद्वान ज्योतिषी आया था, जिसने जोरावर सिंह का टिपड़ा बनाया था। उसने बताया था कि यह अपनी जन्म भूमि से दूर के स्थान में अपनी पहचान बनाएगा और बहुत ही ख्याति, कीर्ति, यश, मान-सम्मान अर्जित करेगा। लेकिन जब वह जवान होगा तो अपने एक रिश्तेदार की हत्या करके यहां से भाग जाएगा।

इस तरह जब जोरावर सिंह 16 साल का हुआ तो उसने संपत्ति के एक विवाद में अपने चचेरे भाई को मौत के घाट उतार दिया और बिलासपुर से भागकर हरिद्वार जा पहुंचा था। 

ऐसा विश्वास किया जाता है कि हरिद्वार में जोरावर सिंह राणा जसवंत सिंह जागीरदार से मिला जो कि गालियां मरमेठी जम्मू के डोडा किश्तवाड़ का जागीरदार था। यह राणा अपने पुत्र फतेह सिंह को वर्ष 1803 में अपनी जागीर का वारिस बना कर आ गया था।

एक दिन जोरावर सिंह उसके शिविर में जा पहुंचा और उससे नौकरी की प्रार्थना की। युवा जोरावर सिंह ने उसे अपनी सारी कहानी बता दी और अपनी पहचान भी बताई। राणा ने उसे नौकरी देकर अपनी जागीर में भेज दिया। कहा जाता है कि यहां उसने राजपूतों की तरह लड़ाई तलवारबाजी सीखी। उस समय वह 20 साल का हो चुका था। यही नहीं वह एक योगी का शिष्य भी बन चुका था और साधारण तरीके से रहने लगा था।

ऐसा लगता है कि जोरावर सिंह कुछ सालों के बाद किश्तवाड़ छोड़कर महाराजा रणजीत सिंह की सेना में लाहौर में जाकर भर्ती हो गया। एक दिन सिक्ख सेना के कमांडिंग ऑफिसर ने जोरावर सिंह को तम्बाकू पीते देख लिया। उसने उसे गालियां दीं।
जोरावर सिंह इससे अपमानित हुआ और उसने उसे वहीं तलवार के एक ही वार से उसे मौत के घाट उतार दिया। 

ऐसा समझा जाता है कि यह सब मुल्तान में हुआ था। जहां महाराजा रणजीत सिंह की आर्मी एक एक्शन में थी।

फिर वहां से रातों-रात भागकर जोरावर सिंह कांगड़ा आ कर राजा संसार चंद की सेना में भर्ती हो गया। राजा संसार चंद और महाराजा रंजीत सिंह की नहीं बनती थी। उन दोनों की सेना में जैसे ही युद्ध हुआ तो सिक्ख सिपाहियों ने जोरावर सिंह को पकड़ लिया। उसको हथकड़ियां पहनाकर देहरा गोपीपुर के किले में कैद कर दिया गया। लेकिन एक रात वह वहां से सारी जंजीरें तोड़ कर भाग गया।

तब उसने निर्णय लिया कि वह जम्मू के जगती के मिंया दिदो के पास जाएगा जोकि सिक्खों को जम्मू क्षेत्र से बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील था। जब वह उसे ढूंढने जा रहा था तो उसे तवी नदी के किनारे राजा गुलाब सिंह मिला, जिसे वह तब नहीं पहचानता था। 

जोरावर सिंह ने उससे मियां दिदो बारे पूछा। उसने बताया कि वह नौकरी की तलाश में है। तब गुलाब सिंह ने उसे अपनी सेना में भर्ती किया।

कुछ समय बाद जोरावर सिंह रियासी के किलेदार के रूप में नियुक्त कर दिया गया। यह 1817 के आसपास की बात है। रियासी में जोरावर सिंह ने खूब पसीना बहाया। उसने स्थानीय विद्रोहियों से लोहा लिया। उनको नेस्तनाबूद किया और अपनी पहचान राजा गुलाब सिंह के पास बनाई। इस तरह राजा गुलाब सिंह ने उसे जम्मू के दूसरे किलों का सुरक्षा का कार्यभार भी संभाल दिया।

राजा गुलाब सिंह महाराजा रणजीत सिंह का पक्षकार था। 

उधर गुलाब सिंह का जोरावर सिंह पर विश्वास दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। उसने उसे लद्दाख जीतने का काम सौंपा। गुलाब सिंह ने कहा कि ये दो बातें ध्यान रखना...... एक तो यह जीत उसे खूब मशहूरी देगी और दूसरे पश्चिम तिब्बत से ऊन के व्यापार के लिए उनकी मनौपली होगी। लद्दाख के सोने की खान वाला ठोक जालंग क्षेत्र भी वह कब्जे में लेना चाहता है जोकि पश्चिम तिब्बत में है।

उस समय लद्दाख तिब्बत के राजा के अधीन था जोकि लेह में रहता था। आज भी उनका पुराना महल वहां देखा जा सकता है। यह सब शक्ति सिंह चंदेल ने अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है।

फिर जोरावर सिंह ने 10000 सैनिकों के साथ लद्दाख पर चढ़ाई कर दी। लद्दाखी डोगरा सैनिकों का हमला बर्दाश्त नहीं कर सके। उनकी भारी हार हुई और उन्होंने जम्मू को पचास हजार रुपए कुछ नकद व कुछ जेवरात के रुप में देने माने और सालाना ₹20,000 देना अलग से माना। इससे गुलाब सिंह ने ₹30,000 महाराजा रणजीत सिंह को दे दिए।

इस तरह से 1840 ई०, तक जम्मू के डोगरों ने लद्दाख के सारे इलाके पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया था। इस से खुश होने के बाद जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत की ओर रुख किया। 
इस अभियान में जनरल जोरावर सिंह ने तिब्बत के काफी इलाके पर कब्जा कर लिया। लेकिन उसकी एक भूल से उसका यह अभियान धराशाई हो गया। 

दरअसल उसने ठंड के मौसम में अपनी सेना के साथ इस अभियान को आगे बढ़ाया। जिससे मौसम की प्रतिकूलता से डोगरा जवान ठंड में लड़ नहीं सके और उनकी हार हुई। इसी अभियान में दिसंबर 12,1841ई, में जोरावर सिंह की गोली लगने से मृत्यु हो गई थी। 

आज भी जनरल जोरावर सिंह की समाधि तकलाकोट और जैदी के बीच स्लिपि गांव में देखी जा सकती है। यह 16000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। 

मानतलाई मानसरोवर का झंडा जो जोरावर सिंह ने 7 अगस्त 1841 को कब्जे में लिया था। वह आज 4 बटालियन जैक राइफल का झंडा है। जोकि जोरावर फोर्स कहलाती है। 

सचमुच बिलासपुर को अपने इस वीर सपूत जनरल जोरावर सिंह की शूरवीरता पर गर्व है।

जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩

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