" भक्तप्रह्लाद और नरसिंहअवतार की कथा "



प्रह्लाद उम्र के बढ़ने के साथ विष्णु का ध्यान करने लगा। हिरण्य कश्यप यह सोच कर चिंता में डूब गया कि ऐसा वंशद्रोही उसके यहाँ कैसे पैदा हो गया। प्रह्लाद का विद्याभ्यास कराने के लिए हिरण्य कश्यप ने उसको अपने गुरुपुत्र चण्ड और मार्क के हाथ सौंप दिया। 

प्रह्लाद ने गुरु कुल में हरि का ध्यान करते हुए अपनी विद्या समाप्त की। अपने सहपाठियों में भी विष्णु भक्ति का प्रचार करके उनके मन में मुक्ति मार्ग के प्रति अभिरुचि पैदा कर दी। 

विद्या की समाप्ति पर चण्ड और मार्क प्रह्लाद को हिरण्य कश्यप के हाथ सौंपने के लिए आये। हिरण्य कश्यप ने अपने पुत्र को प्रेम से जांघ पर बिठाया और पूछा-‘‘बेटा, तुम अपनी विद्या का परिचय कराने वाला एक पद्य सुनाओ! 

प्रह्लाद ने अपने मधुर कंठ से एक पद्य गाकर सुनाया, जिसका अर्थ था - ‘‘मैं ने अपने गुरुजी से सारी विद्याएँ पूर्ण रूप से सीख ली हैं! उन सभी विद्याओं में श्रेष्ठ विद्या विष्णु के प्रति चित्त लगाना है। विष्णु का स्मरण करने से प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सार्थक हो जाता है। 

प्रह्लाद के मुँह से ये बातें सुनकर हिरण्य कश्यप क्रोध से कांप उठा और उसको अपनी जांघ पर से नीचे ढकेल दिया । तब गुरुओं से पूछा-‘‘क्या आप ने हमारे पुत्र को यही शिक्षा दी है? 

चण्ड और मार्क दोनों थर-थर कांपते हुए बोले-‘‘राजन, इसमें हमारा कोई दोष नहीं है! आप हम पर नाराज़ न होइए। ऐसा कहते हुए गुरुकुल में प्रह्लाद के व्यवहार का परिचय दिया। 

हिरण्य कश्यप ने अपने पुत्र को समझाया, ‘‘विष्णु ने सूअर का रूप धर कर तुम्हारे चाचा का संहार किया है। वह हमारे राक्षस कुल का परम शत्रु है! विष्णु का स्मरण करना हमारे वंश का अपमान करना है! वह अक्षम्य अपराध है। तुम उसका स्मरण करना छोड़ दो। 

प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा-‘‘पिताजी, आप दानवों के राजा हैं। मुझको शाप देने में भी आप को संकोच नहीं करना चाहिए। लेकिन मैं क्या करूँ! जैसे लोहे का टुकड़ा चुंबक की ओर आकृष्ट हो जाता है, वैसे ही मेरा मन भी विष्णु की ओर खिंचा हुआ है। जैसे भ्रमर कमल को भूल नहीं सकता है, वैसे मैं भी विष्णु को भूल नहीं सकता। यह मेरे वश की बात नहीं है। मेरे शरीर में प्राण के रहते उनको भूल जाना असंभव है। मेरी आत्मा ही विष्णु स्वरूप है। 

छोटे बालक के मुँह से ऐसी बातें सुन कर हिरण्य कश्यप विस्मय में आ गया। फिर क्रोध में आकर गरजते हुए बोला-‘‘तब तो तुम्हारी मौत निश्चित है। तुम अन्न-जल के बिना मर जाओ! 

इसके बाद प्रह्लाद को कारागार में ढकेल दिया। पुत्र-प्रेम के कारण लीलावती तड़प उठी। लीलावती के दुख को देख हिरण्य कश्यप ने प्रह्लाद को कारागार से मुक्त कर दिया । विष्णु का ध्यान करते तन्मयावस्था में अत्यंत शोभायमान पुत्र को देख हिरण्य कश्यप यह सोचकर आश्चर्य में आ गया कि कई दिनों से अन्न-जल के विना यह कैसे जीवित है? फिर गुस्से में आकर उस बालक को हाथियों के पैरों तले डाल दिया। 

हाथी प्रह्लाद को देख घबरा उठे, मानो सिंह को देख लिया हो। महावतों ने अंकुश चलाकर बालक को हाथियों से रौंदने का प्रयत्न किया। मगर बालक का बाल भी बांका न हो सका। 

सांपों से डंसवाने का प्रयत्न किया गया पर सांप बालक को चूम कर फन फैलाकर नाच उठे। इसके बाद प्रह्लाद को पहाड़ की चोटी पर से नीचे ढकेलवा दिया गया। फिर समुद्र में फेंकवाया गया, कालकूट विष पिलवाया, फिर भी प्रह्लाद को जीवित देख हिरण्य कश्यप ने उससे पूछा, ‘‘तुम क्यों नहीं मरते? इसका क्या रहस्य है? 

प्रह्लाद ने हँसकर उत्तर दिया- ‘‘इस में कोई रहस्य की बात नहीं है! हाथियों में, सांपों में, पत्थर, अग्नि, समुद्र, जहर आदि में ही नहीं, बल्कि आप में और मेरे भीतर भी विष्णु ही विद्यमान हैं! मुझको मारने के प्रयत्न और मेरा जीवित रहना-यह सब उनकी लीलाओं का महात्म्य है, पिताजी। 

प्रह्लाद की बातों से हिरण्य कश्यप का क्रोध भड़क उठा। वह उस बालक की बाँह पकड कर सभा भवन के बीच खींच ले गया और अपना गदा हाथ में ले लिया। उस दृश्य को देख लीलावती बेहोश हो गई। चारों तरफ़ घिरे हुए राक्षस प्रमुख चकित हो मूर्तिवत खड़े रह गये। 

सभा मण्डप के सामने लोहे से निर्मित एक विजय स्तम्भ खड़ा था। हिरण्य कश्यप ने वह स्तम्भ दिखा कर प्रह्लाद से पूछा-‘‘अरे कुलद्रोही! वह मेरा विजयस्तम्भ है! मेरे छोटे भाई का वध करनेवाले विष्णु के साथ युद्ध करके तुम्हारी आँखों के सामने उसका संहार करूँगा । क्या तुम्हारा विष्णु उस स्तम्भ के अन्दर है? 

‘‘आप को संदेह करने की कोई ज़रूरत नहीं है। वे सर्वत्र विद्यमान हैं और उसके अन्दर भी हैं। प्रह्लाद ने झट जवाब दिया। 

हिरण्य कश्यप ने तेज गति से जाकर उस स्तम्भ पर गदा से प्रहार किया। प्रलय ध्वनि के साथ पृथ्वी और आकाश गूँज उठे। धुएँ के बादल चारों तरफ़ फैल गये। स्तम्भ दो दुकड़ों में फट गया। उसके भीतर से चकाचौंध करते हुए दशावतारों में से चौथा नृसिंह अवतार धारण कर विष्णु प्रकट हुए। सिंह का सर, मानव का धड़, हाथों में सिंह के नाखून ऐसा अपूर्व रूप को लेकर नरसिंह प्रलयंकर ध्वनि के साथ गरज उठा। उस वक्त ऐसा लगा मानो पांचजन्य फूंक दिया गया हो। सुदर्शन चक्र उनके चतुर्दिक घूमते हुए दिखाई पड़े।

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद का आलिंगन करके कहा, ‘‘प्रह्लाद, तुम्हारी वजह से इतने साल बाद मुझे विष्णु के साथ लड़ने का मौका मिल गया है। यों कहते गदा उठाकर नरसिंहावतार के साथ लड़ने को तैयार हो गया। नृसिंह ने प्रलय गर्जन करते हुए उछल कर हिरण्य कश्यप को पकड़ लिया और उस को सभा भवन के द्वार तक ले गये। इसके बाद अन्दर व बाहर से अतीत द्वार के चतूबरे पर, रात व दिन से परे संध्या के समय, आकाश व पृथ्वी से भिन्न अपनी जाँघों पर रखकर, अस्त्र-शस्त्र से परे अपने नाखूनों से उन्होंने ब्रह्मा से प्राप्त सभी वरदानों से भिन्न हिरण्यकश्यप को पेट फाड़कर मार डाला। 

नृसिंह ने प्रह्लाद को अपने पिता की अंत्येष्टि क्रिया करने तथा राज्य सूत्र को संभालने का आदेश दिया। फिर उसको आशीर्वाद देकर नृसिंह अवतार विष्णु अंतर्धान हो गये।

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। 
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्यु मृत्युं नमाम्यहम्॥

जय वैदिक सनातन धर्मस्य 🔱🏹🪈🚩

Post a Comment

0 Comments