" साधना और सांसारिक बंधन "

"मन को संसार में कोई नहीं चाहता तन और धन से व्यवहार करो मन परमात्मा में लगाओ"

इष्ट मित्र कुटुम्बो आदि सब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहते हैं। आप के मन को कोई नहीं चाहता! 

अपने पुत्र को लिखने - पढ़ने की सामग्री का प्रबन्ध मत करोष और पास बैठा कर कहो कि बेटा हम मन से तुमको प्यार करते हैं, तो क्या वह संतुष्ट रहेगा? 

अपनी स्त्री की आवश्यकताओं की पूर्ति मत करो और उ
ससे कहो कि हम हमेशा तुम्हारा स्मरण करते रहते हैं, मन से कभी तुमको नहीं भूलते, तो क्या वह संतुष्ट रहेगी?

इष्ट मित्र जो तुमसे व्यवहार में सहायता या सहयोग चाहते हैं उनको कुछ सहयोग न दो और कहो कि मन से हम आपको बहुत मानते हैं। वे यही कहेंगे कि अपना मन अपने पास रखिये, बन सके तो हमारा अमुक - अमुक कार्य कर दीजिये।

तात्पर्य यह कि संसार में कोई भी आप का मन नहीं चाहता। यहाँ सभी तुम्हारे तन और धन के ग्राहक हैं। मन तो तुम जबरदस्ती दूसरों के गले लगाते हो।

स्मरण रखो कि जिस मन को संसार में कोई नहीं चाहता वही मन परमात्मा के निकट पहुँचने में काम आता है। 

इसलिये संसार के बाजार में तन और धन से व्यापार करो और परमात्मा के मार्ग में मन को लगाओ, तो संसार का व्यवहार भी नहीं बिगड़ेगा और परमार्थ का मार्ग भी साफ होता चलेगा।

जिसकी जहाँ जरूरत है उसको वहीं लगाना बुद्धिमानी है। मन को संसारी कार्यों में मत फँसाओ। मन का बहुत थोड़ा सहयोग देने से व्यवहार चलता जायगा। अधिक मन भीतर - भीतर परमात्मा में लगाओ।

जो संसार यहीं छूट जाने वाला है उसमें यहीं छूट जाने वाले तन और धन को लगाओ। जिस परमात्मा का कभी वियोग नहीं होना है उसमें सदा अपने साथ जाने वाले मन को लगाओ।

जैसा सौदा हो वैसा दाम चुकाओ। क्षणभंगुर सांसारिक व्यवहार में क्षणभंगुर तन और धन को ही लगाओ। मन तो सदा साथ रहने वाली स्थायी चीज है, परलोक में भी साथ ही रहेगा। इसलिये इसके साथ स्थायी वस्तु का सम्बन्ध जोड़ो। 

परम स्थायी चराचर में रमा हुआ सर्व व्यापक सदा सर्वत्र विराजमान जो परमात्मा हैं उसके साथ मन का सम्बन्ध जोड़ो। परमात्मा ही मन के साथ सम्बन्ध कराने योग्य है।

और कोई वस्तु संसार में ऐसी नहीं है जिसके साथ मन का सम्बन्ध जोड़कर मन को संतुष्ट किया जा सके।

आप लोगों को स्वयं अनुभव है कि मन को आप धन में, स्त्री में, पुत्र में या इष्ट मित्र में लगाते हैं। पर क्या कहीं पर मन स्थिर रहता है? 

एक स्थान में अधिक समय तक नहीं ठहरता। यदि मन को धन से संतोष हो जाय या पुत्र से संतोष हो जाय तो वह फिर दूसरी जगह क्यों जायगा। किन्तु मन कभी भी एक पदार्थ में नहीं टिकता, यही इस बात का प्रमाण है कि मन को कोई भी सांसारिक पदार्थ अच्छे नहीं लगते। 

किसी पदार्थ को अच्छा मानकर उसके निकट जाता है, परन्तु थोड़ी देर में उससे हट जाता है। इससे मालूम होता है कि कोई भी सांसारिक पदार्थ मन को संतुष्ट नहीं कर सकता।

इसलिये सिद्धान्त यही निकलता है कि संसार में मन को कोई नहीं चाहता और मन भी किसी संसारी वस्तु से संतुष्ट नहीं होता - तात्पर्य यह कि न मन संसार के योग्य है और न संसार मन के योग्य है।

मन जब परमात्मा को पा जाता है तो वहीं स्थिर हो जाता है, फिर कहीं किसी दूसरी वस्तु की इच्छा नहीं करता। इसलिये यही निश्चय होता है कि मन के योग्य परमात्मा ही है। अतः जो वस्तु जिसके योग्य हो उसको वहीं लगाओ।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🚩

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