काश्मीर में एक प्रख्यात महिला संत हुई हैं लल्लेश्वरी। उन्हें लालदेह, लल्ला, ललध्द और“लाल आरिफ़ा” नाम से भी जाना जाता है।
कश्मीरी शैव संप्रदाय की एक फकीर थीं, और साथ ही,एक सूफी संत। वह वत्सुन या वाख नामक रहस्यवादी कविता की रचनाकार हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘भाषण’। लल् वाख के नाम से विख्यात, उनके छंदों में सबसे प्रारंभिक रचनाएँ हैं जो कश्मीरी भाषा और कश्मीरी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
ललध्द और उनके रहस्यवादी विचारों का कश्मीरी आम आदमी पर गहरा प्रभाव है।
लालेश्वरी का जन्म श्रीनगर के दक्षिण-पूर्व में साढ़े चार मील दूर एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ मात्र बारह साल की उम्र में उसकी शादी कर दी गई, लेकिन वह शादी से नाखुश थी और उसने चौबीस साल की उम्र में गृह त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया।
संन्यास (त्याग) लेने और शैव सिद्ध गुरु श्रीकांत (सेड बायू) के शिष्य बनने के बाद उसने कश्मीर में शैववाद की रहस्यवादी परंपरा को जारी रखा,
जिसे 1900 से पहले त्रिक के नाम से जाना जाता था।
रिचर्ड टेंपल ने उनकी कविताओं (जिन्हें वाख कहा जाता है) का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इसके अतिरिक्त अनुवादकों में जयलाल कौल, कोलमैन बार्क्स, जयश्री ओडिन और रंजीत होसकोटे के नाम प्रमुख हैं।
भक्ति में डूबा उनका जीवन कुछ के लिए श्रद्धा का विषय था तो कुछ के लिए मजाक का।
लल्लेश्वरी उपहास का बुरा नहीं मानती थीं। एक सुबह वे मंदिर जा रही थीं तो कुछ बच्चे पीछे लग गए। एक व्यापारी से ये सब देखा नहीं देखा गया तो उसने बच्चों को फटकारा और भगा दिया।
लल्लेश्वरी ये सब देख रही थी। बच्चों के जाने पर उसने व्यापारी से कपड़ा माँगा औरउसे दो टुकड़े कर कंधों पर डाल लिया व्यापारी के साथ मंदिर को चल पडीं। राह में कोई उन्हें श्रद्धापूर्वक अभिवादन करता तो वह बाएँ कंधे पर रखे कपड़े मे एक गाँठ बाँध देतीं, कोई उनका मजाक उड़ाता तो दाएँ कपड़े में गाँठ लगा देतीं। ऐसा करते मंदिर आ गया। तब उसने व्यापारी को कहा कि देख लो कितनी गांठें हैं। व्यापारी ने हैरान रह गया, दोनों में समान गांठें थीं।
लल्लेश्वरी ने समझाया कि सच्चाई और भक्ति के मार्ग पर चलो तो प्रशंसा और निंदा को बराबर समझना। वे दिखाई तो देती हैं लेकिन उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। इस सत्य को समझ तो मन पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता।
ललद्यद का एक लोकप्रिय पद इस प्रकार है –
गगन तू, भूतल भी
तू ही पवन और रात,
अर्घ्य, पुष्प , चंदन, पान
सब-कुछ तू,
फिर चढाउं क्या तात ।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् 🚩
0 Comments