शिव.... गोरख..... 🔱🚩
नागों के बारे में जितना भारत भूमि पर कहा गया है उतना सकल विश्व में नहीं, उसपर बात यह कि जितना कहा गया है उससे ज्यादा अनकहा रह गया है।
#नाग सदा से रहस्यमयी रहे हैं,, मंदिरों के द्वारों पर, गर्भगृहों में, देवताओं के बिछोने के रूप में या छत्र के रूप में, या फिर गले के हार के रूप में, पति के रूप में या पत्नी के रूप में, अवतारों के रूप में परमेश्वर के बाद अगर किसी का नाम आता है तो वे नाग ही हैं।
#कुंडलिनी शक्ति को दर्शाना हो तो भी नाग प्रतीक का ही सहारा लिया जाता है, क्योंकि कुंडली शब्द ही नाग के कारण अस्तित्व में है।
प्रयागराज में अर्जुन की पत्नी नागकन्या उलूपी का मंदिर है तो दक्षिण भारत में विष्णु पद्मनाभ मंदिर।
ऐसे तो हिमाचल में भी एक प्रसिद्ध स्थान है #शिब्बो नाग का,,कहते हैं ये सात भाई थे और सातों के मंदिर भी अलग अलग हैं, लेकिन शिब्बो नाग की एक विशेषता यह है कि वे सबसे ज्यादा देखे जाकर भी सबसे अनदेखे रहे हैं, जैसे गोरखनाथ रहे हैं, देखे इसलिए गए कि ये भगवान शिव के गले में शोभायमान हैं, अनदेखे इसलिए कि उसके बाद किसी ने इनकी सुध नहीं ली,,
प्रभु श्रीराम के लिए #शेषनाग के अवतार रूप में लक्ष्मण जी महाराज हुए,, श्रीकृष्ण के साथ बलराम जी,,ठीक भी है जब विष्णु अवतार होगा तो शेषनाग साथ होंगे ही, लेकिन #शिव इतने विरक्त हो जाएं कि अवतार की अवधारणा से ही बाहर हो जाएं तो क्या हो??
फिर उनके अंश मात्र से रुद्रावतार की एक श्रंखला है, लेकिन सृष्टि में योग के आदि जन्मदाता, यानी उस योगविद्या को प्राणिमात्र के कल्याण के लिए प्रकट करनेहारे के गले के हार का अगर अवतार हो तो क्या??
गुरु गोरखनाथ उसी के अवतार थे, लोकोक्ति हैं, किंवन्दति हैं कि गोरख भी शेषनाग के अवतार थे,, जबकि वे शिब्बो नाग के अवतार थे।
#ओशो ने ध्यान विधियों का मॉडर्नाइजेशन किया, लेकिन विधियां सब गोरखनाथ की रही हैं, ओशो ने एक व्याख्यान में खुद स्वीकार किया कि गुरु गोरखनाथ ने शिव से अलग 700 प्रकार की ध्यान विधियों की खोज की और उन्हें जनमानस में लागू किया,
#महेश योगी से लेकर अन्य भी जितने लोग इस क्षेत्र में रहे उन्होंने गुरु गोरखनाथ की ही ध्यान विधियों को अलग अलग नाम से प्रचारित किया।
एक समय था जब गोरखनाथ ध्यान के क्षेत्र में इतने आगे बढ़ गए थे कि उनसे आगे सिर्फ शिव को ही सोचा जा सकता है।
उनके 1400 शिष्य दिन रात पूरे #जम्बूद्वीप में, जिसमें एक देश आर्यावर्त यानी भारत भी था...
उससे बाहर सुदूर अफ्रीका तक उनकी पहुंच थी, इसलिए मध्यप्रदेश के मांडू में एक इमली के पेड़ पाए जाते हैं जिन्हें गोरख इमली कहते हैं, जबकि यह वृक्ष सिर्फ #अफ्रीका में मिलते हैं,
गुरु गोरखनाथ अपनी ध्यान यात्राओं और शिक्षाओं के साथ जब पृथ्वी पर टहल रहे थे तो इसके बीज अपने साथ लेकर आए।
उन्होंने ध्यान को को इतना फैलाया की कोई कहीं किसी मित्र के पास जाए, किसी रिश्तेदार के पास जाए, या किसी अन्य कार्य से, सामने परिवार वाले ज्यादातर समय ध्यान करते मिलें, कहना पड़े कि छोड़ो भी, यह क्या #गोरखधंधा लगा रक्खा है..!!!
गोरखधंधा ध्यान का पर्याय बन गया था।
बाद में जैसे सब चीजों के साथ हुआ वैसे ही इस पवित्र शब्द के साथ भी छल हुआ,
दुष्टों ने #एजेंडे के तहत जहां शराब बनती हो, जहां जुआ खेला जाता हो, सट्टा चल रहा हो या नकली घी दूध बन रहा हो, अखबार, समाचार, न्यूज चैनल सब यह कहने लगे एक सुर में कि फलानी जगह चल रहा था नकली घी बनाने का गोरखधंधा,
वहां नकली दारू का गोरखधंधा चल रहा था, ये वो... यह वह.. आदि कहकर इसको इतना अपवित्र किया गया कि आज युवा पीढ़ी सोच भी नहीं सकती कि गोरखधंधा शब्द ध्यान से जुड़ा होगा।
ॐ श्री परमात्मने नमः 🚩
जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम् 🚩
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