" थाईलैण्ड की अयोध्या "



( प्रस्तुत लेख एवं शोध श्री जितेन्द्र कुमार सिंह जी द्वारा किया गया है जिनके शोध और अनुसंधान के लिए हम उनका धन्यवाद करते हैं)

अयोध्या का नाम लेते ही स्मृति-पटल पर सरयू के किनारे अवस्थित सूर्यवंश के चक्रवर्ती सम्राटों की उस राजधानी का भव्य चित्र मुखरित होता है, जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की है-

कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्।
निविष्टः सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान्।।
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता।
मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्।।
आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी।
श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा।।

वस्तुतः सरयू के किनारे बसी अयोध्या केवल सूर्यवंशी सम्राटों की राजधानी ही नहीं है, अपितु प्रत्येक हिन्दू के हृदय में बसे भगवान् श्रीराम की जन्मभूमि भी है। इसलिए अथर्ववेद ने आठ चक्रों एवं नौ इन्द्रियोंवाले मनुष्य-शरीर को ही अयोध्या कहा है-
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।

अर्थात् देवपुरी अयोध्या सदृश इस पावन शरीर में एक हिरण्यमय कोश है, जो ज्योति से आवृत स्वर्ग है। यह मस्तिष्क ही स्वर्ग है, जो ज्योति का लोक है और देवों का स्थान है। हिरण्य प्राण, वीर्य और सोम का पर्याय है। इन सब तत्त्वों का वास्तविक कोश मस्तिष्क ही है। मस्तिष्क संकल्पों का स्थान है। संकल्प की सर्वप्रथम चेतना मन में ही स्फूर्त होती है। अतएव मन को निर्विकार रखना आवश्यक है। इसलिए मन को योग-विधि से वश में करना बताया गया है। मदन-दहन करनेवाले योगी की संज्ञा शिव है। 

आर्ष-परिभाषा में मस्तिष्क ज्योतिलोक अथवा दिव्यलोक है। शरीर का शेष भाग असुरलोक अथवा तमोलोक है। योगी अपने विवेक से ज्योति को तम से पृथक् पहचान लेते हैं। यही ज्योति या देवों की विजय है। अयोध्या में अन्ततः देवों की ही विजय होती है। 

अथर्ववेद की इस अवधारणा के अनुसार जहाँ कहीं भी शुद्ध-बुद्ध मनुष्य है, वहीं अयोध्या है। जहाँ अयोध्या है, वहीं राम हैं। जहाँ राम हैं, वहीं अयोध्या है। यही बात वनवास के समय माता सुमित्रा लक्ष्मण से कहती हैं-

वस्तुतः महर्षि वाल्मीकि की उक्ति 'अयोध्यामटवीं विद्धि' के माध्यम से 'जहाँ राम हैं वहीं अयोध्या है' की अवधारणा युगों युगों से चली आ रही है। इसी अवधारणा को थाईलैण्ड-नरेश महाराज रामातिबोधि प्रथम (1350-1369 ई.) ने सन् 1350 ई. में थाईलैण्ड में अयोध्या (Ayutthaya) नगर की स्थापना करके चरितार्थ किया। 

सरयू तट पर अवस्थित अयोध्या से 3607 कि.मी. दूर चौपया (Chao Phraya), पालाक एवं लौपबुरी (Lop Buri) नदियों के संगम तट पर बसी अयोध्या थाईलैण्डवासियों की भगवान् श्रीराम के प्रति अप्रतिम निष्ठा की परिचायक है। दक्षिण-पूर्व एशिया में अवस्थित थाईलैण्ड की प्राक्तन पहचान हिन्दू-संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में है। 

वस्तुतः थाईलैण्ड में केवल अयोध्या और रामकथा ही नहीं, अपितु वहाँ की पूरी सांस्कृतिक परम्परा ही भारतीय है। थाईलैण्ड तथा उसकी राजधानी के नामों का मूल स्रोत केवल भारतीय वाङ्मय में ही उपलब्ध है। तत्त्वतः यह प्राचीन भारत का पूर्वी भाग था। पूर्वी भारत का महावाक्य है- 'अहं ब्रह्माऽस्मि।' भारत में वेद के शब्दों के अनुसार विभिन्न संस्थाएँ बनीं थीं। 'मनुस्मृति' में इसका स्पष्ट उल्लेख है। 

भारत के पूर्वी भाग की भौगोलिक संस्था 'बृहदारण्यकोपनिषद्' के उपर्युक्त महावाक्य के अनुसार ही है। 'अहम्' से असम या वहाँ के निवासी अहोम। 'ब्रह्म' से ब्रह्म देश (बर्मा)। सम्प्रति म्यामार भी ब्रह्मा का ही पर्याय है- महा + अमर = देवों में मुख्य। 

मुण्डकोपनिषद् का आरम्भ ब्रह्मा के स्मरण के साथ ही हुआ है। उसके बाद आता है 'अस्मि'। 'अस्मि' शब्द एक व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। देश के निवासियों के लिए इसका बहुवचन होगा- 'स्यामः', जो थाईलैण्ड का प्राचीन नाम है। हर काल के लिए 'अस्मि' या 'स्यामः' का यह अर्थ स्थायी या सनातन है, जो भारत का धर्म है।

 'स्थायी' का ही अपभ्रंश 'थाई' है, जिससे देश का वर्तमान नाम निष्पन्न हुआ है। स्याम का नाम 23 जून, 1939 ई. को परिवर्तित कर बैंकाॅक कर दिया गया था। बीच में सन् 1946 से 1948 ई. तक इसे पुनः स्याम कहा गया, तत्पश्चात् 11 मई, 1949 ई. को को बैंकॉक नाम पुनः वापस लाया गया। 

बैंकाॅक का मूल रूप 'बैंगकॉक' है (Bangkok), जिसकी निष्पत्ति बांग (Bang) अर्थात् नदी या झरना के तट पर बसा गाँव एवं Ko अर्थात् प्रायद्वीप से हुई है। एक अन्य मान्यता के अनुसार Bangkok शब्द सम्भतः Bang Makok ( Water Olive) से लिया गया है। थाईलैण्ड की वर्तमान राजधानी बैंकाॅक (Bankok) का आधिकारिक नाम विश्व के स्थान-नामों में सर्वाधिक बड़ा है।

बैंकॉक का पूरा नाम 'क्रुंग देवमहानगर अमररत्नकोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महातिलकभव नवरत्नराजधानी पुरीरम्य उत्तमराजनिवेशन महास्थान अमरविमान अवतारस्थित्य शक्रदत्तिय विष्णुकर्मप्रसिद्धि' (กรุงเทพมหานคร อมรรัตนโกสินทร์ มหินทรายุธยา มหาดิลกภพ นพรัตนราชธานีบูรีรมย์ อุดมราชนิเวศน์มหาสถาน อมรพิมานอวตารสถิต สักกะทัตติยวิษณุกรรมประสิทธิ์) है। 

वस्तुतः बैंकाॅक का यह नाम उसकी पूरी परम्परा और इतिहास का द्योतक है। यहाँ ध्यान देनेवाली बात यह है कि इतने बड़े नाम में कहीं भी 'बैंकाॅक' शब्द नहीं है। भारतीय परम्परा के अनुसार 'बैंकाॅक' का मूल 'वैकंक' अथवा 'विकंक' नामक पर्वत है, जिसका उल्लेख 'वायुपुराण' में किया गया है। 'स्याम' अथवा 'सियाम' (Siam) देश के स्वतन्त्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के शताब्दियों पूर्व ही इस भूभाग में रामकथा की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। 

अधिकांश थाईलैण्डवासी परम्परागत रामकथा से परिचित थे। सन् 1238 ई. में स्वतन्त्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई। उस समय इसका नाम स्याम था और प्राचीन नगर का नाम द्वारावती (द्वारिका)। 

बृहत्तर भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर कार्य करनेवाले भारतविद्याविदों की मान्यता है कि 13वीं शती ई. में स्याम देश की जनता के महानायक के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम प्रतिष्ठित हो चुके थे। थाई-नरेश ब्रह्म त्र्यलोक्यनाथ (1448-1488 ई.) की राजभवन - नियमावली में रामलीला का उल्लेख है, जिसकी तिथि 1458 ई. है। थाई-नरेश ब्रह्मकान्त महाधर्मराज द्वितीय (1737-1758 ई.) के राजत्वकाल की रचनाओं में रामकथा के पात्रों तथा घटनाओं का उल्लेख हुआ है। 

थाई-रामायण को रामाख्यान के अर्थ से 'रामकियेन' (Ramakian) कहा जाता है। इसे 'थाईलैण्ड के राष्ट्रीय महाकाव्य' का सम्मान प्राप्त है। मूल 'रामकियेन' 1767 ई. में 'अयुध्या' में नष्ट हो गया। परवर्तिकाल में जब तासकिन (P'ya Taksin 1767-1782 ई.) थाईलैण्ड के सम्राट् बने, तब उन्होंने सन् 1797 ई. से सन् 1807 ई. के मध्य थाईभाषा में 'रामकियेन' नामक रामायण को छन्दोबद्ध किया, जिसके चार खण्डों में 2012 पद हैं। 

पुन: सम्राट् राम प्रथम (1782-1809 ई.) ने अनेक कवियों के सहायता से जिस 'रामकियेन' रामायण का प्रणयन किया, उसमें 50188 पद हैं। यही थाईभाषा का पूर्ण रामायण है। यह विशाल रचना नाटक के लिए उपयुक्त नहीं थी। इसलिए सम्राट् फ्रेंडिन-क्लांग राम द्वितीय (1809-1824 ई.) ने एक संक्षिप्त रामायण की रचना की, जिसमें 14300 पद हैं। 

तदुपरान्त सम्राट् महामोंगकुट राम चतुर्थ (1851-1868 ई.) ने स्वयं पद्य में रामायण की रचना की जिसमें 1664 पद हैं। सम्राट् महावाजिरवुध राम षष्ठ (1910-1925 ई.) ने भी वाल्मीकीयरामायण के आधार पर एक रामलीला लिखी। इसके अतिरिक्त थाईलैण्ड में रामकथा पर आधारित अनेक कृतियाँ हैं। 

थाईलैण्ड का 'शिल्पतोनू' (शिल्पाधिकरण) नामक राजकीय ललित कला संस्थान विशेष अवसरों पर इन राजन्यकृत रामकथाओं का मंचन करवाता है।

थाईलैण्डवासियों ने जब अपनी रामभक्ति और निष्ठा के कारण सरयू के तट पर बसी पुनीत अयोध्या जैसी दूसरी अयोध्या थाईलैण्ड की धरती पर स्थापित करने का शिवसंकल्प चरितार्थ किया, तभी उनके मन में अपनी रामकथा सृजित करने की चेतना भी जागृत हुई। 

अयोध्या के रामभक्त नरेशों ने समय समय पर रामकथा का प्रणयन किया, जिसे थाईलैण्डवासियों ने 'रामकियेेन' की संज्ञा से अलंकृत किया है।

यद्यपि भारतीय रामकथा और 'रामकियेन' में तत्त्वतः कोई अन्तर नहीं है, तथापि भौगोलिक दूरी के कारण कतिपय पात्रों और चरित्रों का निर्माण अपने तरीके से किया गया है। यहाँ थाईलैण्ड की 'रामकियेन' नाम्ना रामकथा के कथानक पर दृष्टिपात करना आवश्यक है। रामकियेन का आरम्भ राम और रावण के वंश-विवरण के साथ अयोध्या और लंका की स्थापना से होता है। 

तदुपरान्त इसमें वालि, सुग्रीव, हनुमान्, सीता आदि की जन्म-कथा का उल्लेख हुआ है। विश्वामित्र के आगमन के साथ कथा की धारा सम्यक् रूप से प्रवाहित होने लगती है, जिसमें राम-विवाह से सीता-त्याग और पुन: युगल जोड़ी के पुनर्मिलन तक की समस्त घटनाओं का समावेश हुआ है। रामकियेन वस्तुत: एक विशाल कृति है, जिसमें अनेकानेक उपकथाएँ सम्मिलित हैं। इसकी तुलना हनुमान् की पूँछ से की जाती है। 

रामकियेन में अनेक ऐसे भी प्रसंग हैं जो थाईलैण्ड को छोड़कर अन्यत्र अप्राप्य हैं। इसमें विभीषण पुत्री वेंजकाया द्वारा सीता का स्वाँग रचाना, ब्रह्मा द्वारा राम और रावण के बीच मध्यस्थ की भूमिक निभाना आदि प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

नाराई (नारायण) ध्यानावस्था में थे। उसी समय क्षीरसागर से एक कमल पुष्प की उत्पत्ति हुई। उस कमल पुष्प से एक बालक अवतरित हुआ। नाराई उसे लेकर शिव के पास गये। शिव ने उसका नाम अनोमतन रख दिया और उसे पृथ्वी का सम्राट् बनाकर उसके लिए इन्द्र को एक सुन्दर नगर का निर्माण करने के लिए कहा। इन्द्र ऐरावत पर आरूढ़ होकर जम्बूद्वीप में एक अत्यन्त रमणीय स्थल पर पहुँचे, जहाँ अजदह, युक्खर, ताहा और याका नामक ऋषि तपस्यारत थे। उन्होंने ऋषियों के समक्ष शिव के प्रस्ताव की चर्चा की। ऋषियों ने द्वारावती नामक स्थल को नगर निर्माण के लिए सर्वोत्तम स्थल बताया, जहाँ पूर्व दिशा में राजकीय छत्र के समान एक विशाल वृक्ष था। 

नगर-निर्माण के बाद इन्द्र ने उन्हीं चार ऋषियों के नाम के आद्यक्षरों के आधार पर उस नगर का नाम अयुताया (अयोध्या) रख दिया। अनोमतन उस नगर के प्रथम सम्राट् बने। इन्द्र ने एक अन्य द्वीप पर जाकर मैनीगैसौर्न नामक एक अपूर्व सुन्दरी की सृष्टि की। सम्राट् अनोमतन का परिणय उसी महासुन्दरी से हुआ। उसे एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अच्छवन था। अपने पिता के बाद वह अयोध्या का सम्राट् बना। उसका विवाह थेपबसौर्न नामक सुन्दरी से हुआ। दशरथ उन्हीं के पुत्र थे।

ब्रह्मा अपने चचेरे भाई सहमालिवान को रंका (लंका) द्वीप से पाताल की ओर भागते देखकर चिन्तित हो गये। लंका द्वीप पर नीलकल नामक एक गगनचुम्बी श्यामपर्वत था, जिसके उत्तुंग शिखर पर कौवों का एक विशाल घोसला था। ब्रह्मा ने उसे शुभलक्षण का संकेत मानकर वहाँ एक नगर निर्माण करने का निश्चय किया। उनके आदेश से विश्वकर्मा ने उस द्वीप पर दुहरे प्राचीरवाले एक सुरम्य नगर का निर्माण किया। ब्रह्मा ने उस नगर का नाम विजयी लंका रखा और अपने चचेरे भाई तदप्रौम को उसका अधिपति बना दिया। उन्होंने उसे चतुर्मुख की उपाधि प्रदान की। चतुर्मुख रानी मल्लिका के अतिरिक्त षोडश सहस्र पटरानियों के साथ वहाँ रहने लगा। 

कालान्तर में मल्लिका के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम लसेतियन था। वह पिता के स्वर्गवास के बाद लंकाधिपति बना। उसे पाँच रानियाँ थीं। पाँचों रानियों से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम कुपेरन (कुबेर), तपरसुन, अक्रथद, मारन और तोत्सकान (दशकण्ठ) थे। कालान्तर में रचदा के गर्भ से कुम्पकान (कुम्भकर्ण), पिपेक (विभीषण), तूत (दूषण), खौर्न (खर) और त्रिसियन (त्रिसिरा) नामक पाँच पुत्र और सम्मनखा (सूर्पणखा) नामक एक पुत्री उत्पन्न हुई।

नन्तौक (नन्दक) नामक हरित देहधारी दानव को शिव ने कैलाश पर्वत पर देवताओं के पादप्रक्षालनार्थ नियुक्त किया था। देवगण अकारण ही कौतुकवश उसके बाल नोच लिया करते थे, जिसके परिणाम स्वरूप कालान्तर में वह गंजा हो गया। नन्दक ने शिव से अपनी व्यथा-कथा सुनायी, तो उन्होंने द्रवित होकर उसकी तर्जनी ऊँगली में ऐसी शक्ति दे दी कि उससे वह जिसकी ओर इंगित कर देता था, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती थी। नन्दक अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने लगा। देवगण व्यग्र होकर शिव को नन्दक की करतूत के विषय में बताये। 

शिव ने नारायण को बुलाकर नन्दक का वध करने के लिए अनुरोध किया। नारायण नर्तकी का रूप धारण कर नन्दक के पास पहुँचे। नन्दक उनके रूप को देखकर मोहित हो गया। नर्तकी रूपधारी नारायण ने इतनी चतुराई से नृत्य किया कि नन्दक ने अपनी ऊँगली से अपनी ओर ही इंगित कर लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। 

मृत्यु के पूर्व उसने नर्तकी को नारायण रूप धारण करते हुए देख लिया। इसलिए प्रत्यक्ष युद्ध नहीं करने के लिए वह उनकी भर्त्सना करने लगा, तब नारायण ने कहा कि अगले जन्म में वह दस सिर और बीस भुजाओंवाले दानव के रूप में उत्पन्न होगा और वे मनुष्य के रूप में अवतरित होकर उसका उद्धार करेंगे।

अयोध्या के निकट साकेत नामक एक नगर था। उसके सम्राट् कौदम (गौतम) थे। सन्तानहीन होने के कारण वे वन में तपस्या करने चले गये। सहस्रों वर्ष वाद उनकी लम्बी और श्वेत दाढ़ी के भीतर गौरैया की एक जोड़े ने घोसला बना लिया। एक दिन नर-पक्षी कमल पुष्प पर खाद्य सामग्री एकत्र करने के लिए बैठा था। उसी समय सूर्यास्त हो जाने के कारण कमल की पंखुड़ियाँ बन्द हो गयीं। पक्षी को रातभर उसी कमल पुष्प के भीतर रहना पड़ा। 

प्रात:काल कमल खिलने पर वह अपनी पत्नी के पास पहुँचा, तो मादा-पक्षी ने उस पर विश्वासघात का आरोप लगाया। नर-पक्षी ने कहा कि यदि उसका आरोप सही है, तो वह ऋषि के सारे पाप का भागी होगा। ऋषि उसकी बात सुनकर चकित हो गये। उन्होंने पक्षी से अपने पाप के विषय में पूछा। पक्षी ने कहा कि नि:सन्तान होना पाप है।

ऋषि को जब अपनी भूल की जानकारी हुई, तो उन्होंने गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का निर्णय लिया। उन्होंने तपोबल से एक सुन्दरी का सृजन किया और उसे अपनी पत्नी बना लिया। उसका नाम अंजना था। अंजना ने स्वाहा नामक एक पुत्री को जन्म दिया। गौतम एक दिन भोज्य सामग्री की तलाश में गये। इसी बीच अंजना का इन्द्र से सम्पर्क हो गया, जिसके फलस्वरूप उसने हरित देहधारी एक पुत्र को जन्म दिया। 

इस घटना के बाद एक बार सूर्य की दृष्टि अंजना पर पड़ी। सूर्य के संयोग से अंजना ने पुन: एक पुत्र को जन्म दिया, जो आदित्य के समान ही देदीप्यमान था। गौतम दोनों को अपना पुत्र समझते थे।

गौतम एक दिन स्नान करने चले, तो उन्होंने एक पुत्र को पीठ पर और दूसरे को गोद में ले लिया। उनकी पुत्री उनके साथ पैदल जा रही थी। उसने गौतम से कहा कि वे दूसरों की सन्तान को देह पर लादे हुए हैं और उनकी अपनी सन्तान पैदल चल रही है। गौतम के पूछने पर उसने सारा भेद खोल दिया। 

गौतम ने क्रुद्ध होकर तीनों को यह कहकर जल में फेंक दिया कि उनकी अपनी सन्तान उनके पास लौट आयेगी और दूसरों की सन्तति बन्दर बन जायेगी। स्वाहा लौट कर उनके पास आ गयी, किन्तु उनके दोनों पुत्र बन्दर बन गये। हरित बन्दर पाली (वालि) और लाल बन्दर सुक्रीप (सुग्रीव) के नाम से विख्यात हुआ।

सम्पूर्ण 'रामकियेन' इस प्रकार के विचित्र आख्यानों से परिपूर्ण है, किन्तु इसके अन्तर्गत रामकथा के मूल स्वररूप में कोई मौलिक अन्तर दृग्गत नहीं होता। 'रामकियेन' के अन्त में सीता के धरती में प्रवेश के बाद राम ने विभीषण को बुलाकर समस्या के समाधान के विषय में पूछा। उन्होंने कहा कि ग्रह का कुचक्र है। उन्हें एक वर्ष तक वन में रहना पड़ेगा। 

उनके परामर्श के अनुसार राम तथा लक्ष्मण, हनुमान के साथ एक वर्ष वन में रहे और उसके बाद अयोध्या लौट गये। अन्त में इन्द्र के अनुरोध पर शिव ने राम और सीता दोनों को अपने पास बुलाया। शिव ने कहा कि सीता निर्दोष हैं। उन्हें कोई स्पर्श नहीं कर सकता, क्योंकि उनको स्पर्श करनेवाला भस्म हो जायेगा। अन्तत: शिव की कृपा से सीता और राम का पुनर्मिलन हुआ।

वस्तुतः 'रामकियेन' केवल रामकथा ही नहीं है, अपितु थाईलैण्ड की अयोध्या का सांस्कृतिक इतिहास भी है। थाईलैण्ड में रामकथा और रामलीला इतनी लोकप्रिय है कि यहाँ के बहुसंख्य लोगों का विश्वास है कि रामायण के पात्र मूलतः इसी क्षेत्र के निवासी थे और रामायण की सारी घटनाएँ इसी क्षेत्र में घटित हुई थीं। 

इसलिए थाईलैण्ड की धरती पर ही राम की अयोध्या भी बसा ली गयी। अयोध्या को यहाँ की भाषा में 'अयुध्या' लिखा जाता है। सन् 1350 से 1463 तक एवं 1488 से 1767 ई. तक अयोध्या को थाईलैण्ड की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। अयोध्या पर पाँच राजवंशों के 33 राजाओं ने शासन किया है।

(अयुध्या) नाम का एक नगर, एक ज़िला, एक प्रान्त और एक बैंक (Bank of Ayudhya Public Company Limited : founded 1945) है। 'अयुध्या हिस्टाॅरिकल पार्क' में प्राचीन अयोध्या नगर के भग्नावशेष संरक्षित हैं। 
थाईलैण्ड के इतिहास में अयोध्या का उल्लेख स्याम देश की राजधानी के रूप में किया गया है। 

अयोध्या नगरी की स्थापना एवं इसके इतिहास में यहाँ के पास-पड़ोस की जगहों का अत्यधिक महत्त्व और योगदान है। 

चौपया (Chao Phraya), पालाक एवं लौपबुरी नदियों के संगम से निर्मित द्वीप पर अवस्थित अयोध्या व्यापार, संस्कृति के साथ साथ आध्यात्मिक अवधारणाओं का भी केन्द्र रही है।

अयोध्या के सम्राट् केवल बौद्ध धर्म माननेवाले ही नहीं, अपितु देवराज भी हैं। इनकी शक्तियाँ केवल सांसारिक ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक भी हैं, जो हिन्दुओं के इष्टदेव इन्द्र एवं विष्णु से सम्पृक्त हैं। 

17वीं शताब्दी के लेखक वैन लिएट ने लिखा है कि स्याम का सम्राट् अपने राज्य के लोगों द्वारा अपने सिद्धान्तों के कारण देवताओं से भी अधिक पूज्य था। सम्राट् के विरुद्ध बोलने पर पन्द्रह वर्ष की सज़ा का प्रावधान था। 

थाई-संस्कृति एवं साहित्य का रामायण और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम से ऐसी आत्मिक सम्बद्धता है कि यहाँ के राजा अपने नाम के साथ 'राम' शब्द सम्पृक्त करते हैं। थाईलैण्ड में सम्प्रति चक्री वंश का शासन है।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार पत्थरों के ढेर में परिवर्तित हो चुकी अयोध्या नगरी का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। यहाँ के अवशेष इसके वैभव का गुणानुवाद करते हैं। 

इन्हीं अवशेषों के आसपास आधुनिक शहर बस जाने से अयोध्या थाईलैण्ड का प्रमुख पर्यटन केन्द्र हो गया है, जिसे देखने प्रति वर्ष लगभग दस लाख लोग आते हैं। अपने शिल्प-वैभव के कारण अयोध्या राजनीतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त प्रभावशाली राज्य माना जाता रहा है। 

मठों, आश्रमों, नहरों एवं जलमार्गों के कारण उस समय इस शहर की तुलना धार्मिक, व्यापारिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से वेनिस और ल्हासा से की जाती थी।

सम्राट् रामातिबोधि द्वारा 1350 ई. में बसाई गयी एवं 33 राजाओं ने सत्ताचक्र की साक्षी रही अयोध्या का पतन 7 अप्रैल, 1767 ई. को बर्मा के आक्रमण से हुआ। इस आक्रमण से अयोध्या पूरी तरह नष्ट हो गयी। 

स्याम की राजधानी कहलानेवाली अयोध्या एक लुटे-पिटे शहर में परिवर्तित हो गयी। अब यह स्याम की राजधानी नहीं रही। यहाँ केवल जंगल रह गये। 

अयोध्या के पतन के पश्चात् फ्रा फ्रेट्ट योट फा चुलालोक (1782-1809 ई.) को थाई-नागरिकों ने अपना सम्राट् घोषित किया, जिनका राज्याभिषेक राम प्रथम के नाम से हुआ। राम प्रथम ने बैंकाॅक में अपनी राजधानी की स्थापना की। 

सन् 1976 ई. में थाइलैण्ड की सरकार ने इस शहर के पुनर्निर्माण पर ध्यान दिया। यहाँ के जंगलों को साफ़ करके अवशेषों की मरम्मत की गयी और विश्व-पटल पर इसे पुनः स्थापित किया गया।

अयोध्या का मुख्य आकर्षण शहर के मध्य अवस्थित प्राचीन पार्क है। इसके बिना शिखरवाले स्तम्भों, दीवारों, सीढ़ियों एवं भगवान् बुद्ध की खण्डित प्रतिमा की ओर लोगों का ध्यान बरबस ही चला जाता है। 

यहाँ की बुद्ध-प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वह प्रतिमा है, जिसमें बलुहे पत्थर से निर्मित बुद्ध का सिर एक पीपल वृक्ष की जड़ों में जकड़ा हुआ है। 

यह पीपल वृक्ष अयोध्या में वट महाथाट अर्थात् 14वीं शताब्दी के प्राचीन साम्राज्य के स्मृतिचिह्नवाले मन्दिरों के अवशेषों में विद्यमान है। शहर में शेष बची बुद्ध-प्रतिमाओं में से कुछ को बेच दिया गया अथवा सफ़ाई के बाद तराश कर उन्हें दोबारा आकार देने की कोशिश की गयी, जिससे उनका मूल स्वरूप नष्ट हो गया।

यहाँ की बुद्ध-प्रतिमा के विषय में एक कथा प्रचलित है कि अयोध्या-नरेश इसी जगह बैठकर ध्यानमग्न थे, तभी उन्हें भूगर्भ से निकलता एक अद्भुत दैवीय प्रकाश दृष्टिगत हुआ। नृपति को भूमि के नीचे गड़ी बुद्ध-प्रतिमा से निकलनेवाला प्रकाश दृग्गत हुआ, इसलिए इसी स्थान पर मन्दिर का निर्माण कराया गया। इसके मध्य में बड़ा-सा प्रांगण, 38 मीटर ऊँची भव्य मीनार और उस पर बनी लपेट छह मीटर ऊँची थी, लेकिन मन्दिर की यह ख़ूबसूरती ज़्यादा दिन तक टिक नहीं पायी और 15वीं शताब्दी में यह ढह गया। अब मीनारों की केवल नींव बची है।

सन् 1424 ई. में राजा रक्षतीरथ द्वितीय द्वारा रक्षबुराना के प्रांगण में अपने पिता की समाधि के ऊपर एक वट बनवाया गया था। यहीं दो स्तूप हैं, जिन्हें राजा ने अपने दोनों भाइयों राजकुमार अई और राजकुमार ई की याद में बनवाया था। अब इन स्तूपों के अवशेष के रूप में केवल नींव ही बची है। 

सन् 1957 में लुटेरों ने किसी पुराने खजाने को प्राप्त करने की आशा में प्रांगण के नीचे सुरंग बना दी। लुटेरे तो पकड़े गये, लेकिन सुरंग ने थाईलैण्ड के ललित कला विभाग को इस जगह और भी ज़्यादा अन्वेषण का अवसर दे दिया।

अयोध्या का सबसे महत्त्वपूर्ण भवन तीन छेदी है, जिसमें तीन राजाओं की खाक मिली है। यह जगह महत्त्वपूर्ण लोगों को समर्पित की गयी है। यहाँ पूजा-अर्चना की जाती थी और समारोह आयोजित होते थे। 'विहार फ्रा मोंग खोन बोफिट' एक बड़ा प्रार्थना स्थल है। यहाँ बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा है। 

यह पहले सन् 1538 ई. में बनायी गयी थी, परन्तु बर्मा द्वारा अयोध्या पर चढ़ाई के दौरान नष्ट हो गयी थी। यह प्रतिमा पहले सभागार के बाहर हुआ करती थी, बाद में इसे विहार के अन्दर स्थापित किया गया। जब विहार की छत टूट गयी, तब एक बार फिर प्रतिमा को काफ़ी नुकसान पहुँचा और राजा महावाजिरवुध राम षष्ठ (1910-1925 ई.) ने लगभग 200 वर्ष बाद इसे वहाँ से हटवा कर संग्रहालय में रखवा दिया। 

सन् 1957 ई. में फाइन आर्ट्स विभाग ने पुराने विहार को फिर से बनवाया और सुनहरे पत्तों से ढँक कर बुद्ध की प्रतिमा को फिर से पुरानी जगह पर रखवाया। फ्रा भेदी सी सूर्योथाई स्मारक रानी सूर्योथाई के सम्मान में बनवाया गया था।

थाईलैण्ड की वर्तमान राजधानी बैंकाॅक से 150 कि.मी. पूर्वोत्तर में लौपबुरी (लवपुरी) नाम का भी एक प्रान्त है, जहाँ इसी नाम की सरिता प्रवाहित है। लौपबुरी प्रान्त के अन्तर्गत 'वांग-प्र' नामक स्थान के सन्निकट 'फाली' (वालि) नामक एक गुफा है। कहा जाता है कि वालि ने इसी गुफा में 'थोरफी' नामक महिष का वध किया था।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि थाई-रामकथा 'रामकियेन' में दुन्दुभि दानव की कथा में किंचित् परिवर्तन हुआ है। इसमें दुन्दुभि राक्षस के स्थान पर थोरफी नामक महाशक्तिशाली महिष है, जिसका वध वालि द्वारा होता है। वालि नामक गुफा से प्रवाहित होनेवाली जलधारा का नाम 'सुग्रीव' है। 

थाईलैण्ड के ही नखोन-रचसीमा प्रान्त के पाक-थांग-चाई नामक स्थान के सन्निकट थोरफी पर्वत है, जहाँ से वालि ने थोरफी के मृत शरीर को उठाकर 200 कि.मी. दूर लैपबुरी में फेंक दिया था। सुखोथाई के निकट सम्पत सरिता के पास 'फ्रा राम' एवं 'सीता' नामक गुफाएँ अवस्थित हैं।

बैंकाॅक में अवस्थित थाईलैण्ड के सर्वाधिक पवित्र बौद्ध-मन्दिर 'वट फ्रा कायो' (full name : Wat Phra Si Rattana Satsadaram, founded 18th century) की भत्तियों पर 178 चित्रों में सम्पूर्ण रामकियेन को चित्रित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि इन चित्रों का निर्माण थाईलैण्ड के महान् सम्राट् फ्रा फ्रुट्ट योट फा चुलालोक राम प्रथम (1782-1809 ई.) के शासनकाल में हुआ था। 

थाईलैण्ड के पाँचवें सम्राट् चुलालोंगकोर्न राम पंचम (1868-1910 ई.) तथा उनके साहित्य-मण्डल के सदस्यों ने समवेत रूप से इन भित्ति

Post a Comment

0 Comments