यह दुर्गयाना मंदिर है, हरि मंदिर (स्वर्ण मंदिर) के समान ही इसकी वास्तुकला है।
इसका इतिहास अद्भुत है और इसे सिद्ध मंदिर माना जाता है। यह हरि मंदिर (स्वर्ण मंदिर) के बहुत क़रीब है।
हर किसी को यहां जाना चाहिए अगर वे अमृतसर जा रहे हैं।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में शिव जी और दुर्गा माँ (शेरांवाली) की प्रतिमाओं को हटाकर महंतो को स्वर्ण मंदिर से तिरस्कृत किया गया था।
गंगा दशमी के दिन 1925 में दुर्ग्याणा मंदिर की नींव पं. मदनमोहन मालवीय के हाथों से रखी गई थी।
सरकार द्वारा दिए गए सख्त आदेशों के अनुसार स्वर्ण मंदिर और इस मंदिर के 200 मीटर के दायरे में तम्बाकू, शराब और मॉस आदि की बिक्री को निषेध किया गया है।
इस मंदिर का निर्माण पवित्र झील के बीचो बीच करवाया गया है जिसका क्षेत्रफल 160 मीटर x 130 मीटर है। इस मंदिर का गुबंद और इसकी छतरियां अमृतसर में स्थित सिखों के स्वर्ण मंदिर के समान ही है।
चांदी के कपाटों के चलते इसे "सिल्वर टेम्पल" भी कहते हैं। मंदिर के गुबंद पर सोने का पानी चढ़ा है। मंदिर के निर्माण में संगमरमर का बड़े स्तर पर प्रयोग किया गया है। रात्रि के दौरान मंदिर के गुबंद को रंगीन लाइटों के द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
मंदिर में प्रवेश करते ही अखंड ज्योति के दर्शन होते हैं। यहां देवी दुर्गा के एक रूप शीतला माता की भी आराधना होती है। दुर्ग्याणा मंदिर परिसर में सीता और हनुमान के मंदिर भी हैं।
लक्ष्मी नारायण मंदिर, सरोवर के बीच है, जिसकी छतरियां और गुंबद ,"स्वर्ण मंदिर" जैसे हैं।
संगमरमर से बने मंदिर तक पहुंच के लिए एक पुल बनाया गया है। मंदिर में कांगड़ा शैली की चित्रकला और शीशे का अद्भुत कार्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला है।
जय वैदिक सनातन धर्मस्य 🏹🔱🪈🚩
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