एक लाख पुत्र होने के बाद भी रावण क्यों हारा ?



इक लख पूत सवा लख नाती । 
तिह रावन घर दिया न बाती ।।

सवा दो लाख की जनसंख्या अगर किसी के सामने खड़ी हो जाए तो उसकी तो जामनी ही जब्त हो जाएगी, उसके सामने कौन लड़ सकता है, कौन भीड़ सकता है लेकिन कंडिशन क्या हुई तुलसीदासजी ने कबीर जी महाराज की वाणी का समर्थन करते हुए कहा...

जगत् बिदित तुम्हारि प्रभुताई ।
सुत परिजन बल बरनि न जाई ।।
राम बिमुख अस हाल तुम्हारा ।
रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ।।

कुछ दिनों पहले मंदोदरी समझा रही थी और आज रावण की लाश पर मत्था टेक कर रो रही है कहा आपने मेरी बात नहीं मानी। 

अरे मैंने तो आपको उस स्थिति में देखा जब आप चलते थे तो पृथ्वी कांपती थी, आप बोलते तो पवन का वेग रुक जाता था, पत्ते झड़ने लगते थे, पत्ते भी वृक्षों से गिरने लग जाते थे, सूर्य की गति रुक जाती थी लेकिन आज बड़ी ही विडंबना है कि आप अनाथ की तरह पृथ्वी पर पड़े हैं।

काक कंक लै भुजा उड़ाहीं ।
एक ते छीनि एक लै खाहीं ।।
अब तव सिर भुज जंबुक खाईं ।
राम बिमुख यह अनुचित नाईं ।।

और थोड़ी देर में मंदोदरी ने देखा एक कौवा आया और रावण की भुजा को खींच कर ले गया और देखा दूसरी तरफ से जो कौवा आ रहा है वह उससे भुजा खींच कर के ले गया, कुत्ते आते हैं वो टांग खींचकर ले जाते हैं गीदड़ नोच नोच कर खा रहे हैं।

जिस रावण के सामने अग्नि चंद्रमा और सूर्य सब तेज हीन थे जिसने अपनी भुजाओं के बल से काल को भी जीत लिया था वह आज अनाथ की तरह पृथ्वी पर पड़ा हुआ है। यह दृश्य मंदोदरी देख रही थी और बहुत तरह से विलाप कर रही थी।

मंदोदरी कर रही है धिक्कार है धिक्कार है अगर धर्म को धारण कर लिया होता तो आज यह दुर्गति नहीं होती।

अबिचल है जो धर्म पर होती उसकी जीत।
अन्यायी की लाश पर कूते गाते गीत।।

तो कहने का तात्पर्य यही है कि धर्म मार्ग को किसी भी हाल में नहीं छोड़ना चाहिए। कभी कभी धर्म मार्ग पर कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है लेकिन उस परीक्षा में तनीक भी विचलित नही होना चाहिए।

" धर्मो रक्षति रक्षत: "

अगर आप धर्म को धारण किए हुए हैं तो एक बार तो शस्त्र भी फेल हो जाता है, सम्पत्ति भी फेल हो जाती है, लेकिन धर्म आपको कभी भी धोखा नहीं दे सकता। 

लेकिन जो धर्म को मिटाने की कोशिश करेगा उसका रावण जैसा ही हश्र होगा चाहे लाख बेटे और सवा लाख पोते क्यों न हो।

सियावर रामचन्द्र की जय 🚩
पवनसुत हनुमान की जय 🚩

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